अपना भी एक घर होगा..

देखे है मैंने जाकरके,

रंग -बिरंगे रूप सदन के;

इस कोने से उस कोने तक 

खड़े हुए थे तले गगन के 

किसी का लंबा, किसी का चौड़ा 

और किसी का छोटा है

लेकिन सबसे मिलकर जाना 

लगता उनको वो अपना है

सर्दी, गर्मी और बरसातों में,

हरदम वो साथ निभाता है|

हर मुश्किल आसान बनाकर,

कितना सुख पहुंचाता होगा; 

कितने खुशकिस्मत होंगे वो,

जिनका अपना एक घर होगा| 

अपना भी एक सपना है,

भीड़ भरी इस दुनियां में;

अपना भी एक घर होगा,

जाने कौन शहर होगा|

#घर

-पंकज मिश्रा

http://www.pankaj0271.wordpress.com

जल ही जीवन है ..

​आज के इस बढ़ती हुई जनसंख्या के दौर में जल के अपव्यय को कम करते हुए इसके संरक्षण की महती आवश्यकता  है | कहा भी जाता है ‘जल ही जीवन है|’

अगर इस तरह से जल का अपव्यय जारी रहा तो शायद वह दिन दूर नही जिस दिन जल को लेकर  सम्पूर्ण विश्व में जंग छिड़ जाये |
इस संबंध में रहीम जी का ये दोहा सार्थक है

#अपील#

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून|

पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून||

#WorldWaterDay

यह कैसा तेरा आचरण है ..

अविस्मरणीय संचरण है, या कोई नूतन चरण है 

हो रही शुरुआत दिन की भोर की कोई किरण है |

है हर जगह अति रम्य पुलकित, 

हर किसी को मोह लेती, 

है हर किसी को देती शरण है|

हो अचंभित है उठता मन मेरा सहसा तभी, 

इस स्वार्थ संसार में, हे प्रकृति! यह कैसा तेरा आचरण है |

#एहसास

मत कहो आकाश में कुहरा घना है..

​आधुनिक समय में जो हालात देश की संसद के है उन हालातों पर प्रहार करती यह कविता…
मत कहो आकाश में कुहरा घना है 

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है 

सूर्य हमने भी नही देखा सुबह से 

क्या करोगे? सूर्य का क्या देखना है ?

इस सड़क पर इस कदर कीचड बिछी है 

हर किसी का  पॉंव घुटनों तक सना है 

पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर है 

बात इतनी है कि कोई पुल बना है 

मत कहो आकाश में कुहरा घना है 

रक्त वर्षों से नसों में ख़ौलता है 

आप कहते है क्षणिक उत्तेजना है 

हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था

शौक से डूबे जिसे भी डूबना है 

दोस्तों अब मंच पर सुविधा नही है 

आज कल नेपथ्य से संभावना है 

मत कहो आकाश में कुहरा घना है |

#dirtypool#indianpolitics

#continuous opposition on notbandi

रह जायेंगे क्या हार-जीत के मायने..

​गलतियों पे गलतियाँ है किये जा रहे 

अब दिखाये यहाँ कौन आईने 

कुछ जिद पर है अपनी अब भी अड़े 

जीतने को है आतुर अब भी खड़े 

रह जायेंगे क्या हार -जीत के मायने

चंद अपने ही होंगे जब खड़े सामने |

#सफर

– पंकज मिश्रा

वह कहता था, वह सुनती थी

​वह कहता था, 

वह सुनती थी,

जारी था एक खेल

कहने-सुनने का।
खेल में थी दो पर्चियाँ।

एक में लिखा था *‘कहो’*,

एक में लिखा था *‘सुनो’*।
अब यह नियति थी 

या महज़ संयोग?

उसके हाथ लगती रही वही पर्ची

जिस पर लिखा था *‘सुनो’*।
वह सुनती रही।

उसने सुने आदेश।

उसने सुने उपदेश।

बन्दिशें उसके लिए थीं।

उसके लिए थीं वर्जनाएँ।

वह जानती थी,

‘कहना-सुनना’

नहीं हैं केवल क्रियाएं।
राजा ने कहा, ‘ज़हर पियो’

*वह मीरा हो गई।*
ऋषि ने कहा, ‘पत्थर बनो’

*वह अहिल्या हो गई।*
प्रभु ने कहा, ‘निकल जाओ’

*वह सीता हो गई।*
चिता से निकली चीख,

किन्हीं कानों ने नहीं सुनी।

*वह सती हो गई।*
घुटती रही उसकी फरियाद,

अटके रहे शब्द,

सिले रहे होंठ,

रुन्धा रहा गला।

उसके हाथ *कभी नहीं लगी वह पर्ची,*

जिस पर लिखा था, *‘कहो’*।
-Amrita Pritam