अस्मतें बेटियों की है लुट रही..

वो हिचकती रही वो सिसकती रही।
कभी चीखी कभी बिलखती रही।।

रात भी रात भर किलकती रही।
जिस्म लुटता रहा रूह तड़पती रही।।

शर्म भी शर्म से है शर्मा गई।
इन्सानियत इंसानों में मर सी गई।।

सोच इंसानों की है बदतर हुई।
अस्मतें बेटियों की है लुट रही।।
©पंकज मिश्रा

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हर चेहरे की हँसी बन जाऊँ..

हर चेहरे की हँसी बन जाऊँ।

हर उस मन को सुकूं पहुँचाऊँ।।
रहता है जो बुझा-बुझा सा।
उसको जीना मैं सिखलाऊँ।।
फिर जीवन हो उदय या अस्त।
या होऊ मैं कितना भी व्यस्त।।
बीज प्यार के बोकर हर दिल में।
नफरत को मैं दूर भगाऊँ।।
फैलाकर खुशबू चाहत की।
मैं सबको फिर गले लगाऊँ।।
बन जाऊं मैं राह कोई।
और लोगों को मंजिल पहुँचाऊँ।।
अंधकारमय जीवन पथ पर।
मैं रश्मि के दीप जलाऊँ।।
अपने लिए तो सब जीते है।
मैं औरों के लिए जी जाऊँ।।
©पंकज मिश्रा

अब मत पूँछो कैसे है देश के हालात..

आखिर दंगे क्यूँ होते है?

लोग जान क्यूँ खोते है?(जवाब अगली कविता में)

अभी हाल ही में कुछ राज्यों में दलित के विरोधों के नाम पर दंगे जैसे हालात नजर आए जिसमें कई लोगों की जानें चली गयी। इन्हीं हालातों के संदर्भ में क्यूँ, कब और कैसे को बताने का प्रयास करती कविता। मेरा मानना है कि हर विषय का आलोचनात्मक समीक्षा की जानी चाहिए ,आलोचना के माध्यम से ही तो गलतियां व कमियाँ उजागर होती है तथा उहमें सुधार व अमल किया जा सकता है।

(निम्न कविता का उद्देश्य किसी पर व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी न होकर बल्कि हकीकत बयां करना है अगर कोई मूकदर्शक बनकर तर्क-वितर्क किये बिना किसी मुद्दे पर सिर हिलाने वाला है तो इस पोस्ट से दूर रहे।)

##देश_हालात

लहू टपकता सिर से और सड़कों पे है जमात।
अब मत पूंछो कैसे है देश के हालात।।

जात-धर्म के नाम पर जनता गई है बाँटी।
जहर घोल के ऊँच-नीच का हाथों में दे दी लाठी।।

कुछ लोगों को तो अस्त्र विद्या में इतना निपुण बनाया है।
पत्थर फिकवाकर के दंगों को भड़काया है।।

कुछ लोगों की आपस में ही थी दुश्मनी दांत काटी।
ऐसे में वे हाथ सेककर चला रहे थे लाठी।।

समझ नही पाये तुम शायद कैसा है ये खेल।
पड़ा कहाँ कमजोर प्रशासन हुआ कहाँ पर फेल।।

दंगे वाले दिन साहब लाठी, गोली चल जाती है।
उसके बाद सड़कों पर पुलिस ही पुलिस नजर आती है।।

सुना कभी था हमने भी यहाँ घटनाये घट जाती है।
लेकिन ये भारत है साहब यहाँ पुलिस देर से आती है।।

अगर एक दिन पहले तुम सड़कों पर फैल गए होते।
पत्ता भी न हिलता दंगे ये ठहर गए होते।।

तुम भी तो आसानी से बातों में आ जाते हो।
भ्रामकता में पड़कर तुम उत्पात मचाते हो।।

अपने ही लोगों पर तुम नफरत का ज्वार उठाते हो।
छोटी-छोटी बातों पर तुम आपस में लड़ जाते हो।।

एक काम की बात मुफ्त में तुमको बतलाता हूँ।
इन जात-धर्म और सबसे भारत पहले आता है।।

ये वो धरती है जहाँ पैदा हुए लोग कई महान है।
मत भूलो तुम सब यह कि पहले हम इंसान है।।

-© पंकज मिश्रा (SPEAKING PEN)

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अँधेरा उस घर में घना न होता..

अँधेरा उस घर में घना न होता,

पथ सच्चाई का उसने अगर चुना होता।
न पालता अहं की ख्वाइशों को,
ख्वाब हकीकत का उसने अगर बुना होता।
न बैठता मुक़द्दर के भरोसे,
राह कर्म की अगर चला होता।
छोड़कर ये शोर-शराबा दुनिया का,
बैठकर निर्जन में कभी खुद को अगर सुना होता।
करके दूर अंधेरे से खुद को,
दीप अच्छाई का रोशन अगर किया होता।
©पंकज मिश्रा

#speakingpen #अँधेरा

मत उठना रे अब तू कल..

मानता हूँ मिट रही है गरीबी देश से लेकिन कुछ तस्वीरे ऐसी भी है अगर सहमत हो तो …शेयर करें ।

तुझे कहाँ से लाऊ मखमल,
दे दे सिर को ये आँचल।
लोरी कौन सुनाऊ पल-पल,
सुन सड़कों का कोलाहल,
सो जा मेरे लाल सदा को।
प्यास बुझाऊँ कैसे तेरी,
बिकता है अब तो ये जल।
ये धरती है तेरा बिस्तर,
और आकाश कम्बल।
सो जा मेरे लाल सदा को,
मत उठना रे अब तू कल।
©पंकज मिश्रा
#poverty #resourcelessness
#socialissues
#speakingpen
Pic credit: Google

तेरे बिना ही मुझको है जिंदगी बितानी..

पोंछ न पाया हूँ इन दृगों से बहता पानी,

सोचा न था कुछ इस तरह बीतेगी ये जवानी।
अंदर भी खलबली है बाहर भी परेशानी,
हालात है ये कैसे ये कैसी तेरी निशानी।
आँखों में है बसी तेरी तस्वीर वो पुरानी
तू ही विषय है मेरा तू ही मेरी कहानी
जब भी बैठता हूँ फुर्सत में कभी
आती है याद मुझको बातें तेरी सुहानी
मासूम तेरा चेहरा और हँसी नूरानी,
तुझे रास नही आयी प्रीत ये निभानी।
अब याद सारी तेरी है भूलनी-भुलानी,
तेरे बिना ही मुझको है जिंदगी बितानी।
©पंकज मिश्रा

करामातें जनता समझने लगी है..

हवाएँ कैसी अब चलने लगी है,

ये दुनियाँ रंग बदलने लगी है।
होता है सड़कों पर रोज तमाशा,
मेरी जान अब तो निकलने लगी है।
कहीं बेफ़िजूली में बरसता है पैसा,
कहीं भूख से वो तड़पने लगी है।
कोई लूटता है कोई जेल जाता,
करामातें जनता समझने लगी है।
कहीं संगमरमर का महल बना है,
कहीं झोपड़ी कोई जलने लगी है।
है झूँठे वादे और झूँठी दिलाशा,
कि जनता अब तरसने लगी है।
©पंकज मिश्रा

#country_sight #politicsinindia

#देशहालात #जनता #developingindia

#ournation

आरक्षण :आर्थिक या जातिगत

हम सब पहले भारतीय है फिर कुछ और, हमारा संविधान भी जिन परिस्थितियों में निर्मित किया गया था वो टल चुकी है।
और हम न जाने कब से चस्मा लगाए बैठे है जब संविधान में संशोधन जैसे प्रावधान विद्यमान है तो फिर हम इनका प्रयोग क्यों नहीं कर लेते। ये तो शराशर नाइंसाफी होगी यदि किसी संस्था में fire distinguisher होते हुए भी आग लगने की स्थिति में उसका प्रयोग न करना।
मुझे भारतीय गद्य साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र के ‘भारत दुर्दशा’ रचना की याद आती है
अंधेर नगरी चौपट राजा,
टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

भारत की राजनीतिक गलियारों की स्थितियां भी इससे कुछ प्रथक दिखाई नही देती। मंचों से दहाड़े सुनाई देती है और कागजों व धरातल पर वास्तविक हकीकत।
किसानों की लागत नहीं निकल पाती है और कुछ बच्चों की भूख से मौत हो जाती है।संविधान के अनुसार हर एक व्यक्ति को काम मिलेगा।
और सरकार के द्वारा काम के लिए विज्ञप्तियाँ निकाली जाती है , फार्म भरे जाते है, लोग जैसे -तैसे पेपर देकर आते है परीक्षाएं गड़बड़/रद्द कर दी जाती है और हम(विद्यार्थी) बस सड़कों पर घूमते रह जाते हैं।(भारत -दुर्दशा)
मौजूदा गला-काट प्रतियोगिता के इस समय में बदलाव होना चाहिए मैं तो इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ और आप?
©पंकज मिश्रा
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अज्ञानता ही समस्त मानवीय समस्याओं की जड़ है…

देश में आज अनेकों समस्याएं विद्यमान है जैसे कि गरीबी, बेरोजगारी, आतंकवाद,आपराधिक प्रवृत्ति, क्षेत्रीयवाद, आंतरिक अशांति, भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और न जाने कितनी ऐसी असंख्य समस्याएँ।
मैं आप लोगों से पूँछना चाहता हूँ कि इन सब समस्याओं के पीछे क्या वजह है?
अगर हम ध्यान से देखें तो सिर्फ एक घटक ऐसा है जो इन सब के लिए अधिकांशतः जिम्मेवार है और वह है ‘अज्ञानता’।
जी हाँ, “अज्ञानता ही समस्त मानवीय समस्याओं की जड़ है”।
अगर व्यक्ति को किसी विषय के बारे में जानकारी होती है तो उसके द्वारा ऐसी समस्याओं के उत्पन्न होने में बहुत कम संभावनाएं होती है।
उदाहरण स्वरूप अगर हम देखें तो एक बालक जो एक ऐसे परिवेश में जन्म लेता है जहाँ उसे मूलभूत सुविधाएं नही मिलती तब वह ज्ञान ज्योति के अभाव में असभ्य व आपराधिक प्रवृत्ति का व विद्रोही हो जाता है यहाँ तक कि उसे खुद से भी कई बार लड़ना पड़ता है।
अतः हमें इस बात को समझने की आवश्यकता है कि शिक्षित होकर ऊँचे भवनों,एसी गाड़ियों मैं घूमने और बैडरूम में बैठकर हाथ में चाय का कप लेकर फ़िल्म देखने की बजाय अपने आस-पड़ोस में घूम-फिरकर ऐसे व्यक्तियों को देखना चाहिए जो किन्हीं कारणों से इस शिक्षा रूपी अमृतपान से वंचित रह गए है तभी हमारे द्वारा अर्जित शिक्षा का वास्तविक अर्थ निकलेगा वरना
आजकल के नवयुवकों की तरह पढ़-लिखकर बेवजह यहाँ-वहाँ मंडराना, राजनीतिक रैलियों में जमकर उत्पात मचाना,लड़कियों के प्रति गंदी मानसकिता रखना और न जाने क्या-क्या करने से इन समस्याओं का जाल फैलता ही जायेगा।
निश्चित ही किसी महान व्यक्ति की यह उक्ति सत्य है कि यदि आप किसी देश का विकास करना चाहते है तो उसके हर व्यक्ति को शिक्षित बना दो।
एक बच्चा समाजरूपी बगीचे में एक बीज की भाँति होता है अगर उसे शैक्षिक जल व समुचित आदर्शवाद व नैतिकता की खाद दें तो फ़िर इस बीज को वृक्ष बनने से कोई नही रोक सकता।
आओ ज्ञान के इस आलोक को हम फैलाएँ।
खुद पढ़ -लिखकर लोगों को शिक्षित बनाएं।।
©पंकज मिश्रा

मैं जीवन जल बोल रहा हूँ…

आज धरती पर पीने योग्य पानी लगभग मात्र 1% रह गया है , स्वच्छ जल के स्रोत चाहे वह पोखर हो या नदी या भूमिगत जल।सभी सूखते जा रहे है ऐसे में हमें जल को व्यर्थ नही बहाना चाहिए।

कहा भी जाता है “जल ही जीवन है।

कवि रहीम की ये पंक्तियां आज भी जल के महत्व को हमारे सामने प्रस्तुत करती है

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून।।

प्रस्तुत है मेरी एक छोटी कविता…

“मैं जीवन जल बोल रहा हूँ..”

रोको, मत बहने दो।

मुझको स्वच्छ रहने दो।

पीने लायक भी बचा नही हूँ,

जाता फैलाया व्यर्थ कहीं हूँ।

कुछ लोगों ने हद है कर दी,

शहरों की निकासी मेरे स्त्रोत में कर दी।

भूमि से इतना है खींचा,

स्तर मेरा हुआ है नीचा।

पोखर सूखे, और सूखी नदियाँ,

मेरे बिना लगे रूखी दुनियाँ।

रंगहीन दिखता हूँ मैं,

बाजारों में भी बिकता हूँ मैं ।

हुआ कभी करता अनमोल,

आज मेरा भी लगा है मोल।

अब भी वक्त है संभल जाओ,

मुझे नही तुम व्यर्थ बहाओ।

बूँद- बूँद को रोको तुम,

वर्षा जल संचयन अपनाओ।

मैं राज ए हकीकत खोल रहा हूँ ,

मैं जीवन जल बोल रहा हूँ।

-@पंकज मिश्रा

#worldwaterday