नई कहानी…

आओ मिलकर लिख दे हम एक नई कहानी,

मैं राजा बन जाऊँगा तुम बन जाना रानी|

-पंकज मिश्रा

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दर्द बेरोजगारी का मुझे बहुत तड़पाता है…

देश में व्याप्त शैक्षिक आरक्षण के कारण व सरकार की दोषपूर्ण नीतियों से ग्रसित एक बेरोजगार छात्र का दर्द..

##बेरोजगार..पर भारी आरक्षण

अंधकार ये गुमनामी का मुझे बहुत डराता है,
दर्द बेरोजगारी का मुझे बहुत तड़पाता है|

नींदे भी रातों में मुझे कहाँ अब आती है,
पढ़ते-पढ़ते पता नही सुबह कब हो जाती है|

घरवाले धक्का देते है और जमाना चिल्लाता है,
लाख छिपाने पर भी ये दर्द आँखों से छलक जाता है|

जैसे तैसे फार्म भरकर पेपर देकर मैं आता हूँ ,
आरक्षण का दानव लेकिन पल में चट सब कर जाता है|

70 और 74 पर एससी, ओबीसी आते है लेकिन जनरल वाला 80 पर भी मिस कर जाता है|

जोरों पर युद्ध छिड़ा है वोट का काँटा यहीं अड़ा है,
आरक्षण(भीखों) की सौगातें ले नेता मंचों पर यहाँ खड़ा है|

सबकी बेहतर तैयारी है पिछड़े बनने की जंग यहाँ पर जारी है|
दुनिया के एक युवा देश में फैली खतरनाक बीमारी है|

लायक से नालायक जब कोई बेटा बन जाता है,
आरक्षण अब नहीं मिटेगा जब मंचों से नेता कोई कह जाता है|
शर्म आती है राजनीति पर और आँख से आँसू आता है,
आरक्षण की लपटों से जब देश झुलस ये जाता है|
-पंकज मिश्रा
#speakingpen
#pankajmishrapoetries

कितना दर्द भरा है अपना ये अफसाना..

कितना दर्द भरा है अपना ये अफसाना,

आवाज भेजता हूँ जरा सुनके इसे बताना|

तुम रहते हो मुझमे हरदम ,मैं तुझमें रहता हूँ हमदम,

जब भी याद तेरी आती है आँखें हो जाती है नम|

नजर जहाँ तक जाती है दिखते हो बस तुम ही तुम,

किस्मत का ये खेल है कैसा मिल न पाए हमतुम|

– पंकज मिश्रा

#speakingpen

#lovepoetries#pain

समर्पित अपना हर एक क्षण कर दो..

छिटक कर स्वेद कणिकाएँ,

धरा का आचमन कर दो|

भरी है तुच्छता मन में,
आज उसको दफन कर दो|
चाहते हो करना हाँसिल अगर कुछ,
समर्पित अपना हर एक क्षण कर दो|
मिलेगा सब तुम्हें पंकज जहां में,
चरणों में मात-पिता के शीश अपना नमन कर दो|
– पंकज मिश्रा

दीपावली के दिन एक दीप तुम जलाना..

दीपावली के दिन एक दीप तुम जलाना..
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं सभी मित्रों को
#diwali2017
#speakingpen
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छत..लघु कथा

झुलसती हुई गर्मी के कारण सबका हाल बेहाल था ऐसे में इंद्र देव की मेहरबानी व वर्षा ऋतु होने के कारण काले बादलों ने आसमान घेर लिया था| सब अपने घरों की ओर भाग रहे थे पक्षी भी अपने घोंसलों में जा चुके थे|

हर बार की तरह फुटपाथ पर बैठा वह बालक अपनी माँ से पूछ रहा था-“माँ ये छत टपक क्यूँ रही है”?

और हर बार की तरह निशब्द माँ एकटक आसमान को निहारे जा रही थी|

-पंकज मिश्रा

#speakingpen

कुछ खोटे सिक्कों की खातिर हमने बचपन भुला दिया है..

आज मुक़द्दर ने हमको फुटपाथों पर सुला दिया है,
कुछ खोटे सिक्कों की खातिर हमने बचपन भुला दिया है|

सपने थे देखे हमने भी,एक घर होगा अपना भी;
सज धज कर स्कूल जाएँगे,गुरुओं से हम ज्ञान पाएँगे;
लेकिन इस किस्मत ने हमको लावारिस बना दिया है,
कुछ खोटे सिक्कों की खातिर हमने बचपन भुला दिया है|

सरकारों ने वादे बतलाये,जाने कितने कानून बनाये;
जो काम मिला करता था कभी, वो भी हमको अब मिल न पाये
बैठे कुछ पल थे,आस लगाए
कोई हमको भी अपनाए,ऐसे में कुछ रहबर भी आए;
देकर कुछ पल को शरण हमें,हाथ कटोरा थमा दिया है;
आज मुक़द्दर ने हमको फुटपाथों पर सुला दिया है|
#बाल मजदूर
– पंकज मिश्रा
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टपक रहा आकाश..

पानी गिर रहा है हो रहा है अद्भुत एहसास|

एक खेत की आज बुझ जाएगी प्यास||

सूखे पोखर, सूखी धरती गर्मी का था त्रास|

देख धरा का दर्द ,आज टपक रहा आकाश||

#एहसास

– पंकज मिश्रा

उनको भी बतला दो जो पड़े हुए खा रहे है पाव..

गड्ढे, किस्मत ,नंगे पाँव चिंता का न कोई भाव,

चेहरे पर भी सिकन नही है आगे बढ़ने का है चाव|

दौड़ रहे है कीचड़ में भी देखो लगा रहे है दाव,

उनको भी बतला दो कोई जो पड़े हुए खा रहे है पाव|

#एहसास

-पंकज मिश्रा