एक बात बताओगे…

एक बात बताओगे।

तुम याद तो न आओगे।।

मैं जी लूँगा तेरे बिन।
क्या तुम जी पाओगे?
इतनी बेरुखी क्यों है?
तू थमी-थमी क्यों है?
मैं आसमां सा दूर,
तू पास जमीं-जमीं क्यों है?
एक बात बताओगे?
रोओगे तो नहीं,
ख्वाबों में कहीं,
खोओगे तो नहीं?
मुझे भूल पाओगे?
एक बात बताओगे?
– पंकज मिश्रा

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मैं तुझ बिन न जी पाऊंगा..

वक्त मिला तो सबसे पहले,
तेरे साथ बिताऊंगा।
थोड़ा और सबब कर ले मां
मैं जल्दी घर आऊँगा।
मां तेरा में ख्याल रखूँगा,
तुझपे प्यार लुटाऊँगा।
भूँख लगेगी अगर तुझे तो,
अपने हाथों से खिलाऊँगा।
थक जाएगी जब भी तू,
मैं कंधों पे तुझे उठाऊँगा।
हर रस्ता पार कराऊँगा,
अगर नींद न आई तुमको।
मैं किस्से तुम्हें सुनाऊँगा,
अगर तुम्हारा बदन दुखा तो।
मैं सारी रात दबाऊंगा,
बीते सारे लम्हे गम में।
अब खुशियां मैं लाऊँगा,
मां तुम चिंता मत करना,
मैं तेरा साथ निभाऊँगा।
हो न सका हाँसिल तुमको जो,
मैं वो सम्मान दिलाऊँगा।
माँ मेरा न साथ छोड़ना,
मैं तुझ बिन न जी पाऊँगा।
©पंकज मिश्रा

याद तुमको अभी भी न आये हैं हम…

छीनकर ख्वाब से तुमको लाये हैं हम।

अक्स कागज़ पर तेरा बनाये हैं हम।।
यादों से याद को सींच लाये हैं हम।
वक्त की डोर को खींच लाये हैं हम।।
मिलके मैं और तुम न हुए हम।
सोचकर बस यही घबराये हैं हम।।
ए सनम तुझको कैसे बतायें हम।
कितने आँसू आज बहाये हैं हम।।
है गिला तुमसे बस इतनी सी।
याद तुमको अभी भी न आये हैं हम।।
© पंकज मिश्रा

पुस्तक..

सुख हो चाहे थोड़े से या गम हो बेहिसाब।
हरदम साथ मैं रहते थे मैं और मेरी किताब।।
ज्ञान बढ़ाया मेरा इसने और दिखाये ख्वाब।
अँधेरों में भी राह दिखाई बनकर आफताब।।
जब भी मैं होता हूँ निराश,
तुमको रख लेता हूँ पास।
गम मेरे सब हर लेती हो,
मन को उज्ज्वल कर देती हो।
अब और नहीं कुछ भी है आस,
तुम रहना मेरी सदा ही खास।
जिस तरह रही तुम भीम के हाथ,
वैसे मेरा भी तुम देना साथ।
©पंकज मिश्रा

जीवन का आधार है धरती..

पृथ्वी ही संसार का अब तक का एक मात्र ऐसा गृह है जिस पर जीवन है। प्रस्तुत है मेरे विचार पृथ्वी पर..एक बार पढियेगा जरूर

जीवन का आधार है धरती,हर प्राणी का संसार है धरती।

कई रूप समेटे गोद में अपनी,प्रकृति का ये उपहार है धरती।।

कोई गोल कहे कोई नारंगी,

सच में खुद है ये बहुरंगी।।

कहीं दिखता तल है तो कहीं-कहीं जल है,

कहीं खेत नजर आते है तो कहीं-कहीं जंगल है।

कहीं पड़ा है खुला समंदर,

कहीं -कहीं हैं सूखे पोखर।

कहीं-कहीं तो जगह है इतनी ,रहने वाले पड़ जाएं कम।

और कहीं-कहीं ऐसा है ,कि हो जाता है दुर्गम।।

कहीं-कहीं पर महल खड़े है ,और कहीं पर है बस्ती मलिन।

कहीं -कहीं पर मस्त पड़े है,और कहीं पर हैं दुर्दिन।।

सदियों से हैं पाला है हमको,दिया हमें है सहारा।

मर कर भी न चुका पाएंगे ,ये उपकार तुम्हारा।।

जिसके बल पर है तू जिया,क्यूँ रूप उसी का बिगाड़ दिया।

कहीं खोदा है, कहीं मोड़ दिया,कहीं काटा है कहीं फाड़ दिया।

निज उन्नति की खातिर ,क्यूँ तूने इसे उजाड़ दिया।।

अब भुगत इन परिणामों को,और झेल सभी इन बाढ़ों को।

तू देख प्रकोप इस गर्मी का ,और भूल जा उन जाड़ों को।।

है वक्त अब भी संभल जा,और मुझसे न खिलवाड़ कर।

तू फैला फिर हरियाली को,हर गलती में सुधार कर।।

©पंकज मिश्रा
#पृथ्वी #पृथ्वी_दिवस #जीवन_का_आधार

अगर तुम हमसफ़र होते..

यूँ तन्हाइयों में न दिन बसर होते।

सफर आसान हो जाता अगर तुम हमसफ़र होते।।
गीत तेरी यादों के न अधरों से मुखर होते।
इन आंखों से निकले आँसू न फिर जहर होते।।
न एक-एक पल फिर आठ-आठ पहर होते।
अगर तुम हमसफ़र होते..।।

©पंकज मिश्रा

Picture with sad quotes
#speakingpen

साथ देता नहीं कोई आजकल..

मर रहा हूँ मैं तो पल-पल

साथ देता नहीं कोई आजकल।।
इससे पहले कि हो जाऊं विकल।
दे दे मुझको मेरा कोई हल।।
शांत सा हूँ खड़ा जैसे शैल अचल।
चाह कर भी नहीं मैं हूँ पाता चल।।
एक सहारा मिले तो मैं जाऊँ संभल।
फिर ये जीवन कठिन से हो जाये सरल।।
©पंकज मिश्रा

मत पूँछों मुझसे कैसे वो दिन कर्फ्यू वाले थे..

आशंका में रखकर जनता को बहुत डराया है।

भोली-भाली जनता के हिस्से में कर्फ्यू आया है।।

सड़कें सूनी, सूनी गालियाँ सूना-सूना बाजार दिखे।

जन जीवन था अस्त व्यस्त सब बेबस और लाचार दिखे।।

आवागमन भी हुआ प्रभावित सबको घर मैं ही कैद किया।

हँसती-खिलती जिंदगी में परेशानियों को उड़ेल दिया।।

कुछ सिर पर रखकर वजन सड़कों पर हैरान दिखे।

कुछ बैठे-बैठे घर पर चिंतित और परेशान दिखे।।

श्रमिकों को भी खाली बैठे खूब पसीना आया है।

हालातों ने इन सबको भूखे पेट सुलाया है।।

सब्जी,पानी और दूध इन सब के भी लाले थे।

दो रुपये की चीज 10 में बेचते साले थे।।

इन्टनेट भी बैन किया था लूट हमारा चैन लिया था।

स्कूल और कॉलेजों में भी लटकते ताले थे।

मत पूँछों मुझसे कैसे वो दिन कर्फ्यू वाले थे।।

©पंकज मिश्रा

अस्मतें बेटियों की है लुट रही..

वो हिचकती रही वो सिसकती रही।
कभी चीखी कभी बिलखती रही।।

रात भी रात भर किलकती रही।
जिस्म लुटता रहा रूह तड़पती रही।।

शर्म भी शर्म से है शर्मा गई।
इन्सानियत इंसानों में मर सी गई।।

सोच इंसानों की है बदतर हुई।
अस्मतें बेटियों की है लुट रही।।
©पंकज मिश्रा

हर चेहरे की हँसी बन जाऊँ..

हर चेहरे की हँसी बन जाऊँ।

हर उस मन को सुकूं पहुँचाऊँ।।
रहता है जो बुझा-बुझा सा।
उसको जीना मैं सिखलाऊँ।।
फिर जीवन हो उदय या अस्त।
या होऊ मैं कितना भी व्यस्त।।
बीज प्यार के बोकर हर दिल में।
नफरत को मैं दूर भगाऊँ।।
फैलाकर खुशबू चाहत की।
मैं सबको फिर गले लगाऊँ।।
बन जाऊं मैं राह कोई।
और लोगों को मंजिल पहुँचाऊँ।।
अंधकारमय जीवन पथ पर।
मैं रश्मि के दीप जलाऊँ।।
अपने लिए तो सब जीते है।
मैं औरों के लिए जी जाऊँ।।
©पंकज मिश्रा