याद तुमको अभी भी न आये हैं हम…

छीनकर ख्वाब से तुमको लाये हैं हम।

अक्स कागज़ पर तेरा बनाये हैं हम।।
यादों से याद को सींच लाये हैं हम।
वक्त की डोर को खींच लाये हैं हम।।
मिलके मैं और तुम न हुए हम।
सोचकर बस यही घबराये हैं हम।।
ए सनम तुझको कैसे बतायें हम।
कितने आँसू आज बहाये हैं हम।।
है गिला तुमसे बस इतनी सी।
याद तुमको अभी भी न आये हैं हम।।
© पंकज मिश्रा

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अगर तुम हमसफ़र होते..

यूँ तन्हाइयों में न दिन बसर होते।

सफर आसान हो जाता अगर तुम हमसफ़र होते।।
गीत तेरी यादों के न अधरों से मुखर होते।
इन आंखों से निकले आँसू न फिर जहर होते।।
न एक-एक पल फिर आठ-आठ पहर होते।
अगर तुम हमसफ़र होते..।।

©पंकज मिश्रा

Picture with sad quotes
#speakingpen

भाषा..

न जाने कितने है नाम,

अभिव्यक्ति है मेरा काम।
मुखरित होती हर अधरों से,
और बाँटती भाव तमाम।
हर भटके को राह दिखाती,
और अधूरे को अंजाम।
अक्षर, शब्दों और वाक्यों से,
शोभित मैं हो जाती हूँ।
छोटे, बड़े और बूढ़ों के,
सबके काम बनाती हूँ।
देश, काल और संस्कृति का,
ज्ञान तुम्हें मैं कराती हूँ।
हिंदी, बांग्ला, उर्दू ,अंग्रेजी,
न जाने क्या-क्या कहलाती हूँ।
@पंकज मिश्रा

साथ देता नहीं कोई आजकल..

मर रहा हूँ मैं तो पल-पल

साथ देता नहीं कोई आजकल।।
इससे पहले कि हो जाऊं विकल।
दे दे मुझको मेरा कोई हल।।
शांत सा हूँ खड़ा जैसे शैल अचल।
चाह कर भी नहीं मैं हूँ पाता चल।।
एक सहारा मिले तो मैं जाऊँ संभल।
फिर ये जीवन कठिन से हो जाये सरल।।
©पंकज मिश्रा

जब से देखा तुझको यार है..(गीत)

जब से देखा तुझको यार है,

हो गया ये दिल फरार है।

चढ़ गया ये कैसा नशा,
छाया ये कैसा खुमार है।
तेरी वो हँसी है मन में बसी,
तू ही तू मुझे हर जगह है दिखी।
तुझसे मिलने की धुन सवार है,
बस तेरा ही इंतजार है।
अब समझ नही कुछ भी आ रहा,
है रास्ता किधर कहाँ मैं जा रहा।
तू कहाँ मेरे यार है,

जीना

तेरे बिना बेकार है।
एक बार मिल तो कहीं,
बात मेरी सुन तो सही।
दीवाना तेरा बेकरार है,
तू ही मेरे दिल में यार है।
©पंकज मिश्रा
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मत पूँछों मुझसे कैसे वो दिन कर्फ्यू वाले थे..

आशंका में रखकर जनता को बहुत डराया है।

भोली-भाली जनता के हिस्से में कर्फ्यू आया है।।

सड़कें सूनी, सूनी गालियाँ सूना-सूना बाजार दिखे।

जन जीवन था अस्त व्यस्त सब बेबस और लाचार दिखे।।

आवागमन भी हुआ प्रभावित सबको घर मैं ही कैद किया।

हँसती-खिलती जिंदगी में परेशानियों को उड़ेल दिया।।

कुछ सिर पर रखकर वजन सड़कों पर हैरान दिखे।

कुछ बैठे-बैठे घर पर चिंतित और परेशान दिखे।।

श्रमिकों को भी खाली बैठे खूब पसीना आया है।

हालातों ने इन सबको भूखे पेट सुलाया है।।

सब्जी,पानी और दूध इन सब के भी लाले थे।

दो रुपये की चीज 10 में बेचते साले थे।।

इन्टनेट भी बैन किया था लूट हमारा चैन लिया था।

स्कूल और कॉलेजों में भी लटकते ताले थे।

मत पूँछों मुझसे कैसे वो दिन कर्फ्यू वाले थे।।

©पंकज मिश्रा

हर चेहरे की हँसी बन जाऊँ..

हर चेहरे की हँसी बन जाऊँ।

हर उस मन को सुकूं पहुँचाऊँ।।
रहता है जो बुझा-बुझा सा।
उसको जीना मैं सिखलाऊँ।।
फिर जीवन हो उदय या अस्त।
या होऊ मैं कितना भी व्यस्त।।
बीज प्यार के बोकर हर दिल में।
नफरत को मैं दूर भगाऊँ।।
फैलाकर खुशबू चाहत की।
मैं सबको फिर गले लगाऊँ।।
बन जाऊं मैं राह कोई।
और लोगों को मंजिल पहुँचाऊँ।।
अंधकारमय जीवन पथ पर।
मैं रश्मि के दीप जलाऊँ।।
अपने लिए तो सब जीते है।
मैं औरों के लिए जी जाऊँ।।
©पंकज मिश्रा

अँधेरा उस घर में घना न होता..

अँधेरा उस घर में घना न होता,

पथ सच्चाई का उसने अगर चुना होता।
न पालता अहं की ख्वाइशों को,
ख्वाब हकीकत का उसने अगर बुना होता।
न बैठता मुक़द्दर के भरोसे,
राह कर्म की अगर चला होता।
छोड़कर ये शोर-शराबा दुनिया का,
बैठकर निर्जन में कभी खुद को अगर सुना होता।
करके दूर अंधेरे से खुद को,
दीप अच्छाई का रोशन अगर किया होता।
©पंकज मिश्रा

#speakingpen #अँधेरा

मैं जीवन जल बोल रहा हूँ…

आज धरती पर पीने योग्य पानी लगभग मात्र 1% रह गया है , स्वच्छ जल के स्रोत चाहे वह पोखर हो या नदी या भूमिगत जल।सभी सूखते जा रहे है ऐसे में हमें जल को व्यर्थ नही बहाना चाहिए।

कहा भी जाता है “जल ही जीवन है।

कवि रहीम की ये पंक्तियां आज भी जल के महत्व को हमारे सामने प्रस्तुत करती है

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून।।

प्रस्तुत है मेरी एक छोटी कविता…

“मैं जीवन जल बोल रहा हूँ..”

रोको, मत बहने दो।

मुझको स्वच्छ रहने दो।

पीने लायक भी बचा नही हूँ,

जाता फैलाया व्यर्थ कहीं हूँ।

कुछ लोगों ने हद है कर दी,

शहरों की निकासी मेरे स्त्रोत में कर दी।

भूमि से इतना है खींचा,

स्तर मेरा हुआ है नीचा।

पोखर सूखे, और सूखी नदियाँ,

मेरे बिना लगे रूखी दुनियाँ।

रंगहीन दिखता हूँ मैं,

बाजारों में भी बिकता हूँ मैं ।

हुआ कभी करता अनमोल,

आज मेरा भी लगा है मोल।

अब भी वक्त है संभल जाओ,

मुझे नही तुम व्यर्थ बहाओ।

बूँद- बूँद को रोको तुम,

वर्षा जल संचयन अपनाओ।

मैं राज ए हकीकत खोल रहा हूँ ,

मैं जीवन जल बोल रहा हूँ।

-@पंकज मिश्रा

#worldwaterday

कविता क्या है?

काव्य’ भाषा का वह उपादान जो भाषा को रसात्मक बना देता है अर्थात जो मानवीय विविधता में संवेदना की एक अनुभूति है | यह एक उदास मन में हर्ष व नीरस मन में प्रेरणा व विक्षिप्त मन में ओज का संचार कर देता है |

निश्चित ही ऐसा कोई उपादान हो ही नही सकता जो पाठक व श्रोता को क्षण में मंत्रमुग्ध कर दे |

कविता क्या है ?

आज़ विश्व काव्य दिवस के अवसर पर इसको मैंने चंद पंक्तियों में व्यक्त करने का प्रयास किया है ..

सुबह की ताजगी सी ह्रदय की छाप है कविता,
धरा से आसमां तक की माप है कविता|
उचित -अनुचित बताने का परिमाप है कविता|
दुखों को क्षण में करके दूर बहुत ,
सुखों को पल में पाने का जाप है कविता |
-©पंकज मिश्रा
#worldpoetryday