दीपावली के दिन एक दीप तुम जलाना..

दीपावली के दिन एक दीप तुम जलाना..
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं सभी मित्रों को
#diwali2017
#speakingpen
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छत..लघु कथा

झुलसती हुई गर्मी के कारण सबका हाल बेहाल था ऐसे में इंद्र देव की मेहरबानी व वर्षा ऋतु होने के कारण काले बादलों ने आसमान घेर लिया था| सब अपने घरों की ओर भाग रहे थे पक्षी भी अपने घोंसलों में जा चुके थे|

हर बार की तरह फुटपाथ पर बैठा वह बालक अपनी माँ से पूछ रहा था-“माँ ये छत टपक क्यूँ रही है”?

और हर बार की तरह निशब्द माँ एकटक आसमान को निहारे जा रही थी|

-पंकज मिश्रा

#speakingpen

कुछ खोटे सिक्कों की खातिर हमने बचपन भुला दिया है..

आज मुक़द्दर ने हमको फुटपाथों पर सुला दिया है,
कुछ खोटे सिक्कों की खातिर हमने बचपन भुला दिया है|

सपने थे देखे हमने भी,एक घर होगा अपना भी;
सज धज कर स्कूल जाएँगे,गुरुओं से हम ज्ञान पाएँगे;
लेकिन इस किस्मत ने हमको लावारिस बना दिया है,
कुछ खोटे सिक्कों की खातिर हमने बचपन भुला दिया है|

सरकारों ने वादे बतलाये,जाने कितने कानून बनाये;
जो काम मिला करता था कभी, वो भी हमको अब मिल न पाये
बैठे कुछ पल थे,आस लगाए
कोई हमको भी अपनाए,ऐसे में कुछ रहबर भी आए;
देकर कुछ पल को शरण हमें,हाथ कटोरा थमा दिया है;
आज मुक़द्दर ने हमको फुटपाथों पर सुला दिया है|
#बाल मजदूर
– पंकज मिश्रा
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साथ यूँ ही सदा तुम देना बहना..

#रक्षाबंधन गीत..2017

बाँध कर डोर रेशम की हाथ पर,

उसने तिलक जो सर पर लगाया मेरे|

मन हर्षित हुआ तन भी खिल गया,

दिल ने दे दी दुआ, हो पूरे  सब अरमां तेरे|| 【1】

चाहे बचपन हो ,या अभी का क्षण
मां सी ममता का मुझको कराया स्मरण|
जब जरूरत पड़ी एक हमदर्द की,
तुम ही बन गए, मित्र सच्चे मेरे|| 【2】

अब तुम्हें क्या बताऊँ, दिल का क्या है कहना?
साथ यूँ ही सदा तुम देना बहना|
हो  मुख पर तबस्सुम सदा तेरे,
तेरे सारे दुःख हो  जाएं मेरे,
मेरे सारे सुख हो  जाएं तेरे|| 【3】
#एहसास
– पंकज मिश्रा

टपक रहा आकाश..

पानी गिर रहा है हो रहा है अद्भुत एहसास|

एक खेत की आज बुझ जाएगी प्यास||

सूखे पोखर, सूखी धरती गर्मी का था त्रास|

देख धरा का दर्द ,आज टपक रहा आकाश||

#एहसास

– पंकज मिश्रा

उनको भी बतला दो जो पड़े हुए खा रहे है पाव..

गड्ढे, किस्मत ,नंगे पाँव चिंता का न कोई भाव,

चेहरे पर भी सिकन नही है आगे बढ़ने का है चाव|

दौड़ रहे है कीचड़ में भी देखो लगा रहे है दाव,

उनको भी बतला दो कोई जो पड़े हुए खा रहे है पाव|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा..

अंधेरों में रश्मि की चमक जब चंदा छोड़ जाएगा;

मुकम्मल हो अमन और चैन अगर,

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा|
वो घाटी में नमाज़ों  के बाद पत्थर फेंक देते है,

मजहब के नाम पर आतंकी रोटी सेंक लेते है|
कहीं पर तो आतंकियों के पोस्टर लगाए है, 

हर एक दिन कर रहे कोई न कोई हत्याएं है|
खून के दागों को दामन से कोई कैसे मिटाएगा?

शहीदों की पुण्यात्मा को श्रद्धाजंलि कैसे दिलाएगा?
मुकम्मल हो अमन और चैन अगर,

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा|

#एहसास

#speakingpen

– पंकज मिश्रा

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है..

कृषकों की पीड़ा को व्यक्त करती  एक कविता..
घुट- घुट के मर जाता है दुख के आँसू वो पीता है,
जिंदा रखने को खुद को जाने वो कैसे जीता है;

कहने को है लोकतंत्र मगर अपने हक़ से वो रीता है,

कुछ धनवानों के हाथों में उसके जीवन का फीता है|

कहने को आज़ाद हुए हम सन सैतालिस की पंद्रह को,

लेकिन गले में डाल दिया है राजनीति के फंदे को|

मौसम की भी मार पड़ी है अजब सी एक लाचारी है,

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है;

 विकास रूपी पंख लगाकर जहां उड़ने की तैयारी है,

जीवन की हत्या करने का खेल यहां पर जारी है|

जो भारत का पेट है भरता वो यहां पर भूँखों मरता,

सरकारों की कृषकों के प्रति भी  जिम्मेदारी है,

उनके हित में निर्णय लेने की अब बारी है|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

बचपन बेताब है..

नापने को आसमां रस्सियों पर, बचपन बेताब है;

नई उम्मीदें , नई आशाएँ, नए – नए ख्वाब है|

पंख भी नही है,और उड़ना बेहिसाब है;

झूलती हुई ज़िन्दगियाँ, मासूमियत की किताब है|

#एहसास

 -पंकज मिश्रा