जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है..

कृषकों की पीड़ा को व्यक्त करती  एक कविता..
घुट- घुट के मर जाता है दुख के आँसू वो पीता है,
जिंदा रखने को खुद को जाने वो कैसे जीता है;

कहने को है लोकतंत्र मगर अपने हक़ से वो रीता है,

कुछ धनवानों के हाथों में उसके जीवन का फीता है|

कहने को आज़ाद हुए हम सन सैतालिस की पंद्रह को,

लेकिन गले में डाल दिया है राजनीति के फंदे को|

मौसम की भी मार पड़ी है अजब सी एक लाचारी है,

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है;

 विकास रूपी पंख लगाकर जहां उड़ने की तैयारी है,

जीवन की हत्या करने का खेल यहां पर जारी है|

जो भारत का पेट है भरता वो यहां पर भूँखों मरता,

सरकारों की कृषकों के प्रति भी  जिम्मेदारी है,

उनके हित में निर्णय लेने की अब बारी है|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

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