उनको भी बतला दो जो पड़े हुए खा रहे है पाव..

गड्ढे, किस्मत ,नंगे पाँव चिंता का न कोई भाव,

चेहरे पर भी सिकन नही है आगे बढ़ने का है चाव|

दौड़ रहे है कीचड़ में भी देखो लगा रहे है दाव,

उनको भी बतला दो कोई जो पड़े हुए खा रहे है पाव|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

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मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा..

अंधेरों में रश्मि की चमक जब चंदा छोड़ जाएगा;

मुकम्मल हो अमन और चैन अगर,

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा|
वो घाटी में नमाज़ों  के बाद पत्थर फेंक देते है,

मजहब के नाम पर आतंकी रोटी सेंक लेते है|
कहीं पर तो आतंकियों के पोस्टर लगाए है, 

हर एक दिन कर रहे कोई न कोई हत्याएं है|
खून के दागों को दामन से कोई कैसे मिटाएगा?

शहीदों की पुण्यात्मा को श्रद्धाजंलि कैसे दिलाएगा?
मुकम्मल हो अमन और चैन अगर,

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा|

#एहसास

#speakingpen

– पंकज मिश्रा

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है..

कृषकों की पीड़ा को व्यक्त करती  एक कविता..
घुट- घुट के मर जाता है दुख के आँसू वो पीता है,
जिंदा रखने को खुद को जाने वो कैसे जीता है;

कहने को है लोकतंत्र मगर अपने हक़ से वो रीता है,

कुछ धनवानों के हाथों में उसके जीवन का फीता है|

कहने को आज़ाद हुए हम सन सैतालिस की पंद्रह को,

लेकिन गले में डाल दिया है राजनीति के फंदे को|

मौसम की भी मार पड़ी है अजब सी एक लाचारी है,

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है;

 विकास रूपी पंख लगाकर जहां उड़ने की तैयारी है,

जीवन की हत्या करने का खेल यहां पर जारी है|

जो भारत का पेट है भरता वो यहां पर भूँखों मरता,

सरकारों की कृषकों के प्रति भी  जिम्मेदारी है,

उनके हित में निर्णय लेने की अब बारी है|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

बचपन बेताब है..

नापने को आसमां रस्सियों पर, बचपन बेताब है;

नई उम्मीदें , नई आशाएँ, नए – नए ख्वाब है|

पंख भी नही है,और उड़ना बेहिसाब है;

झूलती हुई ज़िन्दगियाँ, मासूमियत की किताब है|

#एहसास

 -पंकज मिश्रा

Tere is roop ko dekhne tarsa ye jahan sara hai..

रंग बिरंगा अद्भुत सा,एक मूक नज़ारा है|

मौसम भी अनुकूल बहुत है, ये दृश्य बड़ा ही प्यारा है||

तेरे इस रूप को देखने, तरसा ये जहां सारा है|

इन निर्मम हांथो का देखो, मूकों को सहारा है||

#एहसास

-पंकज मिश्रा