यह कैसा तेरा आचरण है ..

अविस्मरणीय संचरण है, या कोई नूतन चरण है 

हो रही शुरुआत दिन की भोर की कोई किरण है |

है हर जगह अति रम्य पुलकित, 

हर किसी को मोह लेती, 

है हर किसी को देती शरण है|

हो अचंभित है उठता मन मेरा सहसा तभी, 

इस स्वार्थ संसार में, हे प्रकृति! यह कैसा तेरा आचरण है |

#एहसास