मत कहो आकाश में कुहरा घना है..

​आधुनिक समय में जो हालात देश की संसद के है उन हालातों पर प्रहार करती यह कविता…
मत कहो आकाश में कुहरा घना है 

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है 

सूर्य हमने भी नही देखा सुबह से 

क्या करोगे? सूर्य का क्या देखना है ?

इस सड़क पर इस कदर कीचड बिछी है 

हर किसी का  पॉंव घुटनों तक सना है 

पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर है 

बात इतनी है कि कोई पुल बना है 

मत कहो आकाश में कुहरा घना है 

रक्त वर्षों से नसों में ख़ौलता है 

आप कहते है क्षणिक उत्तेजना है 

हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था

शौक से डूबे जिसे भी डूबना है 

दोस्तों अब मंच पर सुविधा नही है 

आज कल नेपथ्य से संभावना है 

मत कहो आकाश में कुहरा घना है |

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