फिर न रहेगी कोई बात जात की …

अगर हमें बुनियादी सुविधाये मिल जाए अर्थात खाने के लिए रोटी , पीने के लिए पानी,  और पहनने के लिए। कपडा .. फिर कैसा भेदभाव , कैसा वर्गवाद…आखिर कब हम समता व् विश्व बंधुत्व का सपना साकार करेंगे

फिर बरत देंगे हम एहतियात
कर दे गर कोई एहतमाम काम की
गुजारिश रहेगी न फिर कोई और
हो जाये जो  गर सह मात की
बदल लेंगे हम नक्शा अपने हुश्न का
फिर न रहेगी कोई बात जात की ||

#आकार

-पंकज मिश्रा

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एक आस मिली हो जैसे मुझको पर्वत चढ़ जाने को ..

मेरे युवा मित्रों आज बहुत समय बाद कोई ऐसा शख्श मिला जिसने एक बुझे हुए कोयले में चिंगारी सी लगा दी
मेरे अंदर का प्रसुप्त ज्वालामुखी धधक उठा है अंदर का जो माहौल है उसी को बयां करती मेरी ये नयी कविता
आशा करता हूँ ये आपको भी उत्साहित करेगी
मैं शुक्रगुजार रहूँगा मनोज कुमार जोशी जी का …

एक आस मिली हो जैसे मुझको पर्वत चढ़ जाने को
एक शख्श था वो जो दिखा गया आइना कुछ कर जाने को

खुद के भीतर ही है सब कुछ क्यूँ व्यर्थ समय करते हो
एक बार खुद ही से पूंछो तुम क्या बन सकते हो

जिद करके हरदम क्यूँ पीछे हटते हो
हर बार असफल होने से  तुम क्यूँ डरते हो

कोई मसीहा नहीं आएगा तुमको कुछ बतलाने को
जो कुछ करना है कर लो फिर नहीं मिलेगा मौका उस पार समंदर जाने को

एक आस मिली हो जैसे मुझको पर्वत चढ़ जाने को
हर बार है मन करता कुछ हद से परे कर जाने को
#पंकज मिश्रा

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फिर सताता रहा क्यूँ मुझे तेरा गम ..

मिल के बिछड़े थे अपनी मर्जी से हम 

फिर सताता रहा क्यूँ मुझे तेरा गम

जब भी किया याद तुझको सनम

आँख क्यूँ हुई है हरदम नम 

अभ्र में  छाई है घटाए गम की घनी  

हो रही है बरसात बिन मौसम

अब है हालात कैसे क्या सुनाऊँ तुझे

राहों पे डगमगाये है मेरे कदम 

गर मिटा दे तू अपने सारे भ्रम

मिल के हो जायेंगे  फिर से एक हम 

मिल के बिछड़े थे अपनी मर्जी से हम 

फिर सताता रहा क्यूँ मुझे तेरा गम 

#एहसास

 – पंकज मिश्रा

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करने को एक मुकाम हाँसिल ….

करने को एक मुकाम हाँसिल अब तो ये बढ़ रहा है 

हर वक़्त कोई न कोई साजिश गढ़ रहा है

देखकर यह सब कुछ अंतस में आज अपने लावा उमड़ रहा है

सब कुछ दिया भुला है एक ध्येय याद रखकर 

हर मोड़ को सहज ही  ये पार कर रहा है 

हर वक़्त उसे है सोचता , हर वक़्त ही है चाहता

हर नींद में उसी के ख्वाब बुन रहा है 

हर हद को पार करके उम्मीद की अपनी जद को बढ़ा रहा है

मेहनत की नाव लेकर कठिनाइयों के सागर को पार कर रहा है

करने को एक मुकाम हाँसिल अब तो ये बढ़ रहा है..

– पंकज मिश्रा

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