अँधेरे में रोशनी की एक किरण

कितना कठिन रहा होगा  उस सामने वाले व्यक्ति का जीवन | जी हाँ इस बात का अनुमान लगाना बहुत ही कठिन होगा किसी भी उस व्यक्ति के लिए जो इन प्रकृतिज उपादानों से परिपूर्ण इस रंगीन संसार के मिज़ाज़ देखने में समर्थ होते है|
इसके ठीक विपरीत मैं अपने आज के उस सफ़र का जिक्र करने जा रहा हूँ मैं जिस ट्रेन मैं बैठा हुआ हूँ उसी ट्रेन में मेरे सामने की बर्थ पर एक व्यक्ति बैठ हुआ था | उस व्यक्ति की असमर्थता व उसके अँधेरे भरे जीवन ने मेरे ऊपर एक असहज भाव छोड़ दिया|  जो मैं अपने दैनिक जीवन में स्वयम् से पूछ लिया करता था | मेरे जीवन जीने की वजह क्या है?
लेकिन उस अँधेरे भरे जीवन में जो एक जीने की उम्मीद लिए वो आदमी जी रहा था|  शायद उससे बहुत कुछ सीखने को को मिल चुका था|
इस पूरी यात्रा के दौरान मैंउसके ऑटोसेंस से चकित था| जिस तरह से वह अन्य सभी साधारण लोगो की तरह अपना फ़ोन उठाता था, जिस तरह से वह समय बता देता था|

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दर्द भरी शायरी….

इतनी ख्वाइशें थी दिल में कि हर एक ख्वाइश पर दम निकले…
जितने अरमां थे दिल में बहुत निकले तो कम निकले…..!!

चूमकर तेरे बदन को ए सरफ़राज़…
उसने सारे जहाँ में ख़ुशबू को फैला दिया…
ढूंढता है अक़्स तेरा आज भी ये काफिर जहाँ….!!

A sole night at noisy place

14 February especially which is known for  valentine day. Everybody is curious about that day and this question? Who will be my Valentine ? But in the opposition having not a valentine …i am wandering today alone outside the home. This fascinates me because it makes me glad that suddenly my

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friends joined me and the night is still remain….

शौक नही है मुझे लिखने का…
मगर जब उठाते है कलम
जो दिख जाता है….
वो लिख जाता है..!
बस यही तक नहीं है सीमित अपना सफ़र…
कुछ लोग इसे कहते है शब्दों का सजर…
तो कुछ ने इसे कहा है हुनर…

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कोहिनूर

कोहिनूर हीरा

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श्रापित कोहिनूर का राज ?
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कहते हैं बिजली एक बार गिरे तो वह दुर्घटना है, उसी स्थान पर जब वह दूसरी बार गिरे तो वह एक इत्तेफाक है लेकिन अगर समान स्थान
पर तीसरी बार भी बिजली गिरे तो समझ लेना चाहिए कि यह किसी का श्राप है.

भारत का विश्वविख्यात धरोहर कोहिनूर हीरा, जिसे अंग्रेज भारत से दूर लंदन ले गए थे, भले ही दुनिया का सबसे अनमोल
हीरा क्यों ना हो लेकिन उसके साथ भी एक ऐसा श्राप जुड़ा है जो मौत तो लाता ही है लेकिन पूरी तरह तबाह और बर्बाद करने के बाद.

कोहिनूर अर्थात कोह-इ-नूर, का अर्थ है रोशनी का पहाड़, लेकिन इस हीरे की रोशनी ने ना जाने कितने ही साम्राज्यों का पतन कर दिया.
वर्तमान आंध्र-प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित एक खदान में से यह बेशकीमती हीरा खोजा गया था. ऐतिहासिक दस्तावेजों में सबसे पहले
इस हीरे का उल्लेख बाबर के द्वारा “बाबर नामा” में किया गया था. बाबरनामा के अनुसार यह हीरा सबसे पहले सन 1294 में ग्वालियर
के एक अनाम राजा के पास था. लेकिन उस समय इस हीरे का नाम कोहिनूर नहीं था. लेकिन लगभग 1306 ई. के बाद से ही इस हीरे
को पहचान मिली.
कोहिनूर हीरा हर उस पुरुष राजा के लिए एक श्राप बना जिसने भी इसे धारण करने या अपने पास रखने की कोशिश भी की.

इस हीरे के श्राप को इसी बात से समझा जाता है कि जब यह हीरा अस्तित्व में आया तो इसके साथ इसके श्रापित होने की भी बात सामने
आई कि: “इस हीरे को पहनने वाला दुनिया का शासक बन जाएगा, लेकिन इसके साथ ही दुर्भाग्य भी उसके साथ जुड़ जाएगा, केवल ईश्वर
और महिलाएं ही किसी भी तरह के दंड से मुक्त होकर इसे पहन सकती हैं.”
कई साम्राज्यों ने इस हीरे को अपने पास रखा लेकिन जिसने भी रखा वह कभी भी खुशहाल नहीं रह पाया. इतिहास से जुड़े दस्तावेजों के
अनुसार 1200-1300 ई. तक इस हीरे को गुलाम साम्राज्य, खिलजी साम्राज्य और लोदी साम्राज्य के पुरुष शासकों ने अपने पास
रखा और अपने श्राप की वजह से यह सारे साम्राज्य अल्पकालीन रहे और इनका अंत जंग और हिंसा के साथ हुआ. लेकिन जैसे ही यह
हीरा 1326 ई. में काकतीय वंश के पास गया तो 1083 ई. से शासन कर रहा यह साम्राज्य अचानक 1323 ई. में बुरी तरह गिर गया.
काकतीय राजा की हर युद्ध में हार होने लगी, वह अपने विरोधियों से हर क्षेत्र में मात खाने लगे और एक दिन उनके हाथ से शासन
चला गया.
काकतीय साम्राज्य के पतन के पश्चात यह हीरा 1325 से 1351 ई. तक मोहम्मद बिन तुगलक के पास रहा और 16वीं शताब्दी के
मध्य तक यह विभिन्न मुगल सल्तनत के पास रहा और सभी का अंत इतना बुरा हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.
शाहजहां ने इस कोहिनूर हीरे को अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया लेकिन उनका आलीशान और बहुचर्चित शासन उनके बेटे औरंगजेब के हाथ
चला गया. उनकी पसंदीदा पत्नी मुमताज का इंतकाल हो गया और उनके बेटे ने उन्हें उनके अपने महल में ही नजरबंद कर दिया.
1605 में एक फ्रांसीसी यात्री, जो हीरों जवाहरातों का पारखी था, भारत आया और उसने कोहिनूर हीरे को दुनिया के सबसे बड़े और
बेशकीमती हीरे का दर्जा दिया. 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर आक्रमण कर दिया. इस
तरह मुगल सल्तनत का पतन हो गया और सत्ता फारसी शासक नादिर शाह के हाथ चली गई. 1747 में नादिर शाह का भी कत्ल
हो गया और कोहिनूर उसके उत्तराधिकारियों के हाथ में गया. लेकिन कोहिनूर के श्राप ने उन्हें भी नहीं बक्शा. सभी को सत्ताविहीन कर
उन्हीं के अपने ही समुदाय पर एक बोझ बनाकर छोड़ दिया गया.

फिर यह हीरा पंजाब के राजा रणजीत सिंह के पास गया और कुछ ही समय राज करने के बाद रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई और उनके बाद
उनके उत्तराधिकारी गद्दी हासिल करने में कामयाब नहीं रहे. आखिरकार ब्रिटिश राजघराने को इस हीरे के श्रापित होने जैसी बात समझ में
आ गई और उन्होंने यह निर्णय किया कि इसे कोई पुरुष नहीं बल्कि महिला पहनेगी. इसीलिए 1936 में इस हीरे को किंग जॉर्ज षष्टम
की पत्नी क्वीन एलिजाबेथ के क्राउन में जड़वा दिया गया और तब से लेकर अब तक यह हीरा ब्रिटिश राजघराने की महिलाओं के ही सिर
की शोभा बढ़ा रहा है.

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कोहिनूर हीरे का इतिहास
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कोहिनूर (फ़ारसी: कूह-ए-नूर )जिसका अर्थ है, आभा या रोशनी का पर्वत। यह एक १०५ कैरेट (२१.६ g) का हीरा है। यह कभी विश्व का सबसे बड़ा ज्ञात हीरा रह चुका है। कोहिनूर
हीरा, भारत की गोलकुंडा की खान से निकला बताया जाता है। यह कई मुगल व फारसी शासकों से होता हुआ, अन्ततः ब्रिटिश शासन के अधिकार में लिया गया, व उनके खजाने में
शामिल हो गया, जब ब्रिटिश प्रधान मंत्री, बेंजामिन डिजराएली ने महारानी विक्टोरिया को १८७७ में भारत की सम्राज्ञी घोषित किया।
अन्य कई प्रसिद्ध जवाहरातों की भांति ही, कोहिनूर की भी अपनी कथाएं रही हैं। इससे जुड़ी मान्यता के अनुसार, यह पुरुष स्वामियों का दुर्भाग्य व मृत्यु का कारण बना, व
स्त्री स्वामिनियों के लिये सौभाग्य लेकर आया । अन्य मान्यता के अनुसार, कोहिनूर का स्वामी संसार पर राज्य करने वाला बना ।
उद्गम व आरम्भिक इतिहास
इसका उद्गम स्पष्ट नहीं है। दक्षिण भारत में, हीरों से जुड़ी कई कहानियां रहीं हैं, परन्तु कौन सी इसकी है, कहना मुश्किल है।
कई स्रोतों के अनुसार, कोहिनूर हीरा, लगभग ५००० वर्ष पहले, मिला था, और यह प्राचीन संस्कृत इतिहास में लिखे अनुसार स्यमंतक मणि नाम से प्रसिद्ध रहा था। हिन्दू कथाओं के
अनुसार[1] , भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं यह मणि, जाम्बवंत से ली थी, जिसकी पुत्री जामवंती ने बाद में श्री कृष्ण से विवाह भी किया था। जब जाम्वंत सो रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने यह
मणि चुरा ली थी। एक अन्य कथा अनुसार, यह हीरा नदी की तली में मिला था, लगभग ३२०० ई.पू. [2] ।
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, यह गोलकुंडा की खान से निकला था, जो आंध्र प्रदेश में, विश्व की सवसे प्राचीन खानों में से एक हैं। सन १७३० तक यह विश्व का एकमात्र
हीरा उत्पादक क्षेत्र ज्ञात था। इसके बाद ब्राजील में हीरों की खोज हुई। शब्द गोलकुण्डा हीरा, अत्यधिक श्वेत वर्ण, स्पष्टता व उच्च कोटि की पारदर्शिता हे लिये प्रयोग
की जाती रही है। यह अत्यधिक दुर्लभ, अतः कीमती होते हैं।
इस हीरे के बारे में, दक्षिण भारतीय कथा, कुछ पुख्ता लगती है। यह सम्भव है, कि हीरा, आंध्र प्रदेश की कोल्लर खान, जो वर्तमान में गुंटूर जिला में है, वहां निकला था [3] ।
दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश का अंत १३२० में होने के बाद गियासुद्दीन तुगलक ने गद्दी संभाली थी। उसने अपने पुत्र उलुघ खान को १३२३ में काकातीय वंश के राजा प्रतापरुद्र
को हराने भेजा था। इस हमले को कड़ी टक्कर मिली, परन्तु उलूघ खान एक बड़ी सेना के साथ फिर लैटा । इसके लिये अनपेक्षित राजा, वारंगल के युद्ध में हार गया। तब वारंगल
की लूट-पाट, तोड़-फोड़ व हत्या-काण्ड महीनों चली। सोने-चांदी व हाथी-दांत की बहुतायत मिली, जो कि हाथियों, घोड़ों व ऊंटों पर दिल्ली ले जाया गया। कोहिनूर हीरा भी उस लूट
का भाग था। यहीं से, यह हीरा दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकारियों के हाथों से मुगल सम्राट बाबर के हाथ १५२६ में लगा।
इस हीरे की प्रथम दृष्टया पक्की टिप्पणी यहीं सन १५२६ से मिलती है। बाबर ने अपने बाबरनामा में लिखा है, कि यह हीरा १२९४ में मालवा के एक (अनामी) राजा का था। बाबर ने
इसका मूल्य यह आंका, कि पूरे संसार को दो दिनों तक पेट भर सके, इतना म्हंगा। बाबरनामा में दिया है, कि किस प्रकार मालवा के राजा को जबरदस्ती यह विरासत अलाउद्दीन
खिलजी को देने पर मजबूर किया गया। उसके बाद यह दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकारियों द्वारा आगे बढ़ाया गया, और अन्ततः १५२६ में, बाबर की जीत पर उसे प्राप्त हुआ।
हालांकि बाबरनामा १५२६-३० में लिखा गया था, परन्तु इसके स्रोत ज्ञात नहीं हैं। उसने इस हीरे को सर्वदा इसके वर्तमान नाम से नहीं पुकारा है। बल्कि एक विवाद [1] के बाद यह
निष्कर्ष निकला कि बाबर का हीरा ही बाद में कोहिनूर कहलाया।
बाबर एवं हुमायुं, दोनों ने ही अपनी आत्मकथाओं में, बाबर के हीरे के उद्गम के बारे में लिखा है। यह हीरा पहले ग्वालियर के कछवाहा शासकों के पास था, जिनसे यह तोमर राजाओं के
पास पहुंचा। अंतिम तोमर विक्रमादित्य को सिकंदर लोधी ने हराया, व अपने अधीन किया, तथा अपने साथ दिल्ली में ही बंदी बना कर रखा। लोधी की मुगलों से हार के बाद, मुगलों ने
उसकी सम्पत्ति लूटी, किन्तु राजकुमार हुमायुं ने मध्यस्थता करके उसकी सम्पत्ति वापस दिलवा दी, बल्कि उसे छुड़वा कर, मेवाड , चित्तौड़ में पनाह लेने दिया। हुमायुं की इस भलाई के
बदले विक्रमादित्य ने अपना एक बहुमूल्य हीरा, जो शायद कोहिनूर ही था, हुमायुं को साभार दे दिया। परन्तु हुमायुं का जीवन अति दुर्भाग्यपूर्ण रहा। वह शेरशाह सूरी से हार गया।
सूरी भी एक तोप के गोले से जल कर मर गया। उसका पुत्र व उत्तराधिकारी जलाल खान अपने साले द्वारा हत्या को प्राप्त हुआ। उस साले को भी उसके एक मंत्री ने तख्तापलट कर
हटा दिया। वह मंत्री भी एक युद्ध को जीतते जीतते आंख में चोट लग जाने के कारण हार गया, व स्ल्तनत खो बैठा। हुमायुं के पुत्र अकबर ने यह रत्न कभी अपने पास नहीं रखा,
जो कि बाद में सीधे शाहजहां के खजाने में ही पहुंचा। शाहजहां भी अपने बेटे औरंगज़ेब द्वारा तख्तापलट कर बंदी बनाया गया, जिसने अपने अन्य तीन भाइयों की हत्या भी की थी ।
कोहिनूर की भिन्न कोणों से टैवर्नियर की अभिकल्पना
सम्राटों के रत्न
शाहजहां ने कोहिनूर को अपने प्रसिद्ध मयूर-सिंहासन (तख्ते-ताउस) में जड़वाया। उसके पुत्र औरंगज़ेब ने अपने पिता को कैद करके आगरा के किले में रखा। यह भी कथा है, कि उसने
कोहिनूर को खिड़की के पास इस तरह रखा, कि उसके अंदर, शाहजहां को उसमें ताजमहल का प्रतिबिम्ब दिखायी दे। कोहिनूर, मुगलो के पास १७३९ में हुए ईरानी शासक नादिर शाह के
आक्रमण तक ही रहा। उसने आगरा व दिल्ली में भयंकर लूटपाट की। वह मयूर सिंहासन सहित कोहिनूर व अगाध सम्पत्ति फारस लूट कर ले गया। इस हीरे को प्राप्त करने पर ही,
नादिर शाह के मुख से अचानक निकल पड़ा: कोह-इ-नूर , जिससे इसको अपना वर्तमान नाम मिला । १७३९ से पूर्व, इस नाम का कोई भी सन्दर्भ ज्ञात नहीं है।
कोहिनूर का मूल्यांकन, नादिर शाह की एक कथा से मिलता है। उसकी रानी ने कहा था, कि यदि कोई शक्तिशाली मानव, पाँच पत्थरों को चारों दिशाओं, व ऊपर की ओर,
पूरी शक्ति सहित फेंके, तो उनके बीच का खाली स्थान, यदि सुवर्ण व रत्नों मात्र से ही भरा जाये, उनके बराबर इसकी कीमत होगी।
सन १७४७ में, नादिर शाह की हत्या के बाद, यह अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली के हाथों में पहुंचा। १८३० में, शूजा शाह, अफगानिस्तान का तत्कालीन पदच्युत शासक
किसी तरह कोहिनूर के साथ, बच निकला; व पंजाब पहुंचा, व वहां के महाराजा रंजीत सिंह को यह हीरा भेंट किया। इसके बदलें स्वरूप, रंजीत सिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को,
अपनी टुकड़ियां अफगानिस्तान भेज कर, अफगान गद्दी जीत कर, शाह शूजा को वापस दिलाने के लिये तैयार कर लिया था।
हीरा भारत के बाहर निकला
रंजीत सिंह, ने स्वयं को पंजाब का महाराजा घोषित किया था। १८३९ में, अपनी मृत्यु शय्या पर उसने अपनी वसीयत में, कोहिनूर को पुरी , उड़ीसा प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ, मंदिर को दान
देने को लिखा था। किन्तु उसके अंतिम शब्दों के बारे में विवाद उठा, और अन्ततः वह पूरे ना हो सके। २९ मार्च , १८४९ को लाहौर के किले पर ब्रिटिश ध्वज फहराया। इस तरह पंजाब,
ब्रिटिश भारत का भाग घोषित हुआ। लाहौर संधि का एक महत्वपूर्ण अंग निम्न अनुसार था: “कोह-इ-नूर नामक रत्न, जो शाह-शूजा-उल-मुल्क से महाराजा रण्जीत सिंह
द्वारा लिया गया था, लाहौर के महाराजा द्वारा इंग्लैण्ड की महारानी को सौंपा जायेगा।”
इस संधि का प्रभारी गवर्नर जनरल थे, लॉर्ड डल्हौज़ी, जिनकी कोहिनूर अर्जन की चाह, इस संधि के मुख्य कारणों में से एक थी। इनके भारत में कार्य, सदा ही विवाद ग्रस्त रहे, व
कोहीनूर अर्जन का कृत्य, बहुत से ब्रिटिश टीकाकारों द्वारा, आलोचित किया गया है। हालांकि, कुछ ने यह भी प्रस्ताव दिया, कि हीरे को महारानी को सीधे ही भेंट किया जाना चाहिये
था, बजाय छीने जाने के; किन्तु डल्हैज़ी ने इसे युद्ध का मुनाफा समझा, व उसी प्रकार सहेजा।
बाद में, डल्हौज़ी ने, १८५१ में, महाराजा रण्जीत सिंह के उत्तराधिकारी दलीप सिंह द्वारा महारानी विक्टोरिया को भेंट किये जाने के प्रबंध किये। तेरह वर्षीय, दलीप ने इंग्लैंड
की यात्रा की, व उन्हें भेंट किया। यह भेंट, किसी रत्न को युद्ध के माल के रूप में स्थानांतरण किये जाने का अंतिम दृष्टांत था।
महान प्रदर्शनी
१८५१ में, लंदन के हाइड पार्क में एक विशाल प्रदर्शनी में, ब्रिटिश जनता को इसे दिखाया गया।
मुकुट/किरीटों की शोभा
कोहिनूर के नरे तराशों की प्रति
रत्न के कटाव में कुछ बदलाव हुए, जिनसे वह और सुंदर प्रतीत होने लगा। १८५२ में, विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट की उपस्थिति में, हीरे को पुनः तराशा गया, जिससे वह १८६
१/६ कैरेट से घट कर १०५.६०२ कैरेट का हो गया, किन्तु इसकी आभा में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई। अल्बर्ट ने बुद्धिमता का परिचय देते हुए, अच्छी सलाहों के साथ, इस कार्य में
अपना अतीव प्रयास लगाया, साथ ही तत्कालीन ८००० पाउण्ड भी, जिससे इस रत्न का भार ४२% घट गया, परन्तु अल्बर्ट फिर भी असन्तुष्ट थे। हीरे को मुकुट में अन्य दो हजार
हीरों सहित जड़ा गया।
बाद में, इसे महाराजा की पत्नी के किरीट का मुख्य रत्न जड़ा गया। महारानी अलेक्जेंड्रिया इसे प्रयोग करने वाली प्रथम महारानी थीं। इनके बाद महारानी मैरी थीं। १९३६ में, इसे
महारानी एलिज़ाबेथ के किरीट की शोभा बनाया गया। २००२ में, इसे उनके ताबूत के ऊपर सजाया गया।
प्रचलित इतिहास
दुनिया के सबसे दुर्लभ और बेशकीमती हीरे ‘कोहिनूर’ की ब्रिटेन की महारानी के मुकुट तक पहुँचने की दास्तान महाभारत के कुरुक्षेत्र से लेकर गोलकुण्डा के ग़रीब मजदूर की कुटिया तक
फैली हुई है। ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा और दुनिया के अनेक बादशाहों के दिलों को ललचाने की क्षमता रखने वाला अनोखा कोहिनूर दुनिया में आखिर कहाँ से आया, इस बारे
में ऐतिहासिक घटनाओं के अलावा बहुत सी कथाएँ और किंवदन्तियाँ भी प्रचलित हैं। यह हीरा अनेक युद्धों, साज़िशों, लालच, रक्तपात और जय-पराजयों का साक्षी रहा है।
कोहिनूर की एक और प्रति
दुनिया के सभी हीरों का राजा है कोहिनूर हीरा। इसकी कहानी भी परी कथाओं से कम रोमांचक नहीं है। कोहिनूर के जन्म की प्रमाणित जानकारी नहीं है पर कोहिनूर का पहला उल्लेख
३००० वर्ष पहले मिला था। इसका नाता श्री कृष्ण काल से बताया जाता है।पुराणों के अनुसार स्वयंतक मणि ही बाद में कोहिनूर कहलायी।ये मणि सूर्य से कर्ण को फिर अर्जुन और
युधिष्ठिर को मिली।फिर अशोक, हर्ष और चन्द्रगुप्त के हाथ यह मणि लगी।सन् १३०६ में यह मणि सबसे पहले मालवा के महाराजा रामदेव के पास देखी गयी। मालवा के
महाराजा को पराजित करके सुल्तान अलाउदीन खिलजी ने मणि पर कब्जा कर लिया।बाबर से पीढी दर पीढी यह बेमिसाल हीरा अंतिम मुगल बादशाह औरंगजेब को मिला। ’ज्वेल्स आफ
बिट्रेन’ का मानना है कि सन् १६५५ के आसपास कोहिनूर का जन्म हिन्दुस्तान के गोलकुण्डा जिले की कोहिनूर खान से हुआ।तब हीरे का वजन था 787 कैरेट।इसे बतौर तोहफा खान
मालिकों ने शाहजहां को दिया।सन्1739 तक हीरा शाहजहां के पास रहा। फिर इसे नादिर शाह के पास रहा। इसकी चकाचौधं चमक देखकर ही नादिर शाह ने इसे कोहिनूर नाम दिया।
कोहिनूर को रखने वाले आखिरी हिन्दुस्तानी पंजाब का रणजीत सिंह था। सन् १८४९ मे पंजाब की सत्ता हथियाने के बाद कोहिनूर अंग्रेजों के हाथ लग गया।फिर सन् १८५० में ईस्ट
इण्डिया कम्पनी ने हीरा महारानी विक्टोरिया को भेंट किया।इंग्लैण्ड पंहुचते-पंहुचते कोहिनूर का वजन केवल १८६ रह गया।महारानी विक्टोरिया के जौहरी प्रिंस एलवेट ने कोहिनूर
की पुन: कटाई की और पॉलिश करवाई। सन् 1852 से आज तक कोहिनूर को वजन १०५.६ ही रह गया है।सन् १९११ में कोहिनूर महारानी मैरी के सरताज में जड़ा गया।और आज
भी उसी ताज में है।इसे लंदन स्थित ‘टावर आफ लंदन’ संग्राहलय में नुमाइश के लिये रखा गया है।

Aankhen…..

Hai ghar ki ‘muhafij’ meri dehki hui aankhe,
main taak mein rakh aaya hu jalti hui aankhe,
Ek pal bhi kisi mod pe rukne nahi deti,kaanto ki tarah jism mein chubti hui aankhe,
Raste mein kadam foonk ke rakhna mere pyaro,hai charo taraf sehar mein bhikri hui aankhe,
Yu uske bichad jaane pe aanshu n bahao,manjar ko taras jayengi bhigi hui aankhe,
Kaatil ke siwa koi samjh hi nahi sakta,kya dekti hai tast mein rakhi hui aankhe,
Kya jaaniye kis khawab ki taabir mein gum hai,julfo ki ghani chav mein uljhi hui aankhe,’
sagar’ shabe-teera mein ujhalo ki ami hai,nafrat ke samundar mein ye behti hui aankhe.

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Indian constitution

Indian Constitution when adopted by Constituent Assembly in 1949 had 395 articles and 22 parts. Many other articles and three other parts were added to it by subsequent constitutional amendments. Asof now Indian constitution contains more than 444 articles in 25 parts. In this post. let’s check out the must know articles of Indian Constitution.Must Know Articles of Indian ConstitutionArticleImportanceArticle 12 –35Specify the Fundamental Rights availableArticle 36-50Specify the Directive Principles of state policyArticle 51ASpecifies the Fundamental Duties of every citizenArticle 80Specifies the number of seats forthe Rajya SabhaArticle 81Specifies the number of seats forthe Lok SabhaArticle 343Hindi as official languageArticle 356Imposition of President’s Rule instatesArticle 370Special status to KashmirArticle 395Repeals India Independence Actand Government of India Act, 1935PS : It’s not expected from a UPSC aspirant to by-heart all articles in Indian Constitution. But he/she is expected to have a fair idea about the nature and salient features of Indian Constitution like Federalism, Separation of Powers, Fundamental Rights etc.Important Articles of Indian ConstitutionPart 1 – Art. 1 to art. 4*.Article 1- Name and territory of the union.*.Article 2 – Admission and Establishment of the new state.*.Article 3 – Formation of new states and alteration of areas, boundaries, and name of existing states.Part 2 – Art. 5 to art. 11*.Article 5 – Citizenship at the commencement of the constitution.*.Article 6- Rights of citizenship of certain person who have migrated to India from Pakistan.*.Article 10- continuance of rights of citizenship.*.Article 11- Parliament to regulate the right of citizenship by law.Part 3 – Art.12 to art.35*.Article 12- Definition of the state*.Article 13 Laws inconsistent with or in derogation of the fundamental rights.*.Originally, constitution provided for 7 basic fundamental rights, now there is only six rights, one Right to property U/A 31 was deleted from the list of fundamental rights by 44th amendment act 1978. It made a legal right U/A 300-A in Part XII of the constitution.Some important Fundamental Rights are as:Right to Equality: Art. 14 to Art. 18*.Article 14- Equality before the law.*.Article 15- Prohibition of discrimination onthe grounds of religion, race, caste, sex. Orplace of birth.*.Article 16- Equality of opportunity in matters of public employment.*.Article 17- Abolition of the un-touchability.*.Article 18- Abolition of titlesRight to Freedom: Art. 19 to art. 22Art.19 guarantees to all the citizens the six rights1.· (a) Right to freedom of speech and expression.2.· (b) Right to assemble peacefully andwithout arms.3.· (c) Right to form associations or unions.4.· (d) Right to move freely throughout the territory of India.5.· (e) Right to reside and settle in any part of the territory of India.6.· (f) Right to practice any profession or to carry on any occupation, trade, and business.*.Article 20- Protection in respect of conviction for offences.*.Article 21-Protection of life and personal liberty.*.Article 22- Protection against arrest and detention in certain cases.Right against Exploitation: Art.23 & art. 24*.Article 23- Prohibition of traffic in human beings and forced labour.*.Article 24- Prohibition of employment of children in factories and mines. Under ageof 14.Right to Freedom of Religion: Art.25 to art. 28*.Article 25- Freedom of conscience and free profession , practice and propagationof religion.*.Article 26- Freedom to manage religious affairs.*.Article 27- Freedom as to pay taxes for promotion of any particular religion.*.Article 28- Freedom from attending religious instruction.Cultural and Educational Rights:Art.29 & art. 30*.Article 29- Protection of interest of minorities.*.Article 30- Right of minorities to establish and administer educational institutions. *.Article 32- Remedies for enforcement of Fundamental Rights.

Decreasing public value of hindi ….why?

ंकोई कुछ भी हिन्दी के बारे में बोल सकता है । शरम किसे आती है ?  क्यों आनी चाहिए ? यह किस चिड़िया का नाम है ?  संविधान में,  हिन्दी को भारत संघ की ‘राजभाषा’ घोषित कर दिया गया है । सारा देश यह जानता होगा !  भारत का संविधान है । उसमें सब कुछ लोकतांत्रिक है । जो लिखा है – वह लागू होगा – 15 साल,  या उसके बाद पचास साल बाद, 60 साल बाद (रिटायरकरने की उम्र तक) या उसके बाद 70, 80, 90 साल बाद तक – कभी भी ! लोकतांत्रिक सरकारें आएंगी और जाएंगी – क्या फर्क पड़ता है ?  हिन्दी कोई एक सूत्री कार्यक्रम थोड़े है ! संविधान में कई अनुच्छेदों में यह व्यख्यायित है, पर इसको लागू करने के प्रसंग में न जाने कार्यान्वयन के मार्ग में कितने छेद बने हैं जहां से यह फिसल कर फिर वहीं चली जाती है जहां से वह अपनी यात्रा प्रारम्भ किए होती है  । संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक एवं भाग-5, भाग-6  एवं भाग -17  तथा अष्टम अनुसूची में भाषा संबंधी और राजभाषा सम्बधी बड़े सुविचारित प्रावधान दिए गए हैं ! वह आजादी के बाद लागू हो रहे हैं –रह-रह कर, अपनी एक खास रफ्तार में !  आप प्रश्न-चिह्न नहीं लगा सकते हैं, सोच लीजिएगा – सरकारी मामला है ! मतलब – कोई भी, कहीं कह सकता है – हिन्दी में क्या है ?  अंग्रेजी के शब्द को देवनागरी में लिख दो और अटको मत, भटको मत, जैसी आती है, वैसी है लिख दो –  चल पड़ोफाइलों पर, सरकारी पत्रों में – इसी तरह ! कितनी सरल है बिचारी – यह हिन्दी । सब की कनिया, सब की बहुरिया !  हिन्दी के देह पर नागफनी रोप दो । दवा के काम आएगी !बोले जाने वालों की दृष्टि से दुनियां में बोली जाने वाली (प्रयोग में आने वाली) यह भाषा हिन्दी,  दुनियां की भाषाओं के बीच अब दूसरे नबंर पर आ गई है । बस,  आ गई है – सरकारी आंकड़ों में आनी बाकी है । बाकी, पूरी बस ही खाली है । एक बिचारा ड्राइवर (बस चालक नहीं लिखना चाह रहा था पर लिख दिया हूँ – इस देश के अंग्रेजी दाँ को शायद वह अटपटा लगे !) दूसरा खलासी । महामहिम राष्ट्रपति जी के आदेशों का पालन तो इस लोकतांत्रिक देश में होना चाहिए कि नहीं ! और नहीं होता है उनके आदेशों का पालन तो उसकी कोई सजा मुकर्र नहीं की जा सकती – क्यों ?  क्योंकि “जाति, धर्म, मूलवंश, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर किसी भी भारतके नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता ?”  संविधान के अनुच्छेद 15 मेंस्पष्ट है कि – “राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थानया इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।”   फिर संस्कृति और शिक्षा के अधिकारों के संरक्षण की व्यव्स्था भी की गई है – संविधान के अनुच्छेद 29 एवं 30 के अनुच्छेदों (आर्टिकल्स) में । इस संरक्षण ने भारत के शासन की भाषा अर्थात् राजभाषा हिन्दीके विकास को ही निरस्त कर रखा है – अप्रत्यक्ष रुप से । भाई, यह आपके संविधान की व्यवस्था है ! आप पहले ठीक से पढ़िए अपना संविधान तब पोस्टर ले के हल्ला बोलिए कि – “ हिन्दी के अच्छे दिन कब आएंगे ।” भाई नौकरी में आने पर हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्तकरना जरुरी है  – केन्द्र सरकार के सेवकों को । ” फिर लोकसभा एवं राज्य-सभा में चुन कर आने वाले संसद सदस्यों को पांच साल के बीच हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान क्यों नहीं प्राप्त करना चाहिए ? संविधान में इस संबंध में प्रावधान क्यों नहीं किया गया है या अब क्यों नहींकिया जा सकता है ?  क्यों केन्द्र सरकार  की सेवा में मूल रुप से हिन्दी में काम नहीं हो सकता ?  अनुवाद के नाम पर अंग्रेजी ही क्यों परोसी जा रही और हिन्दी की रुप-रेखा बिगाड़ीजा रही – बार- बार । मैकाले ने जो किया सो किया – क्या उसमें सुधार नहीं हो सकता आज ?सोचना होगा देश के नागरिकों को ?  जब देश के शासन की राजभाषा हिन्दी है तो अल्पसंख्यक समुदायों को भी हिन्दी का हिस्सा बनाया जाए । शिक्षा के हर स्तर पर हिन्दी एक विषय के रुपमें पढ़ाई जाए और उसमें पास होना अनिवार्य किया जाए । दोहरी राजनीति ने देश के उत्थान को ही नहीं अवरुद्ध किया है बल्कि वह भारत के आम जन को शासन की भाषा से काट कर रखा है । भारतका अधिकांश नागरिक न तो ठीक से हिन्दी लिख पाता है और न अंग्रेजी ही लिख पाता है । अब आप ही बताइए कि वह शासन की नीतियों को कैसे सही तरह से जान सकेगा, समझ सकेगा ? हिन्दी विरोध की राजनीति ने भारत की आम जनता के साथ अन्याय किया है क्योंकि वह भारत जैसे बहुभाषी देश के आम जनों को उनकी ऱाजभाषा के ज्ञान से वंचित रखा है ।संसद में चुन के आने के बाद संसदीय कार्य कैसे किए जाने चाहिए – इसकी कक्षा लगा कर ज्ञानजब दिलाया जाता है जो इस देश में हीं दिलाया जा सकता है ! तो हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान संसद सदस्यों को क्यों नही दिलाया जा सकता ? उनके लिए यह अनिवार्यता, क्यों नहीं है ?  अंगूठा छाप संसद सदस्य भी, संसद में किसी बिल पर मंतव्य दे कर, वोट दे कर, उसे पास करवा सकता है, गिरा और गिरवा सकता है । इस देश के अधिनियम और नियम तो ऐसे ही बनते हैं । क्योंकिजनता सर्वोपरि है ! उन्होंने ही उन्हें चुना है या उन्होंने जनता से खुद को चुनवा लिया है? खीरा चाकू पर पड़े या चाकू खीरा पर !  फिर, हिन्दी तो बड़े विवादों के बाद एक मत ज्यादामिलने से भाग्यवश राजभाषा घोषित कर दी गई । और हिन्दी को संविधान में राजभाषा का दर्जा देना पड़ा । कितना हल्ला हुआ था – दक्षिण भारत में (एक अजीब विरोधाभास – जहां भारतीय संस्कृति जीवित बची रही हर बाहरी आक्रमणों के वावजूद ! वहीं उसकी धरोहर भाषा हिन्दी के हत्या की राजनीतिक ऊठा-पटक और दांव पर दाँव और बेहद जघन्य कुकृत्य भाषा की, एक भारतीय भाषाकी ही हत्या का ? जनतंत्र में कुछ भी हो सकता है । अब्राह्म लिंकन ने कहा था Democracy is the government of the people, for the people & by the people – Abraham Lincoln  . आपजानते होंगे कि अब्राह्म लिंकन  अमरीका के सोलहवें राष्ट्रपति थे । उनका कहना था कि   – “एक प्रजातांत्रिक सरकार,  जनता की, जनता जनता के लिए और जनता द्वार चुनी गई सरकार होती है ।” फिर जनता सही है तो सरकार कैसे गलत हो जाती है ?  यह लालबुझक्कड़ ही जानें मेरी समझ में तो नहीं आता ।  अब जनता के प्रतिनिधियों ने हिन्दी को राजभाषा घोषित कर दिया और संविधान में इस निर्णय के अनुसार सुविचारित प्रावधान  कर दिए गए । पर संसद में सांसद, किसीभी भाषा में बोल सकते हैं ! j राजभाषा हिंदी में बोलने की अनिवार्यता नहीं है । ऐसा कोई प्रावधान नहीं है न जी !  आप समझिए क्या हुआ नीति का और उसके कार्यान्वयन का ? विधान करनेवाले लोगों के हाथों में ही लूप भी है और होल भी है । लूप और होल की हिन्दी आप समझ ही गए होंगे । अंग्रेजी शब्द को देवनागरी में लिखिए, हिंदी का रंग निखरता जाएगा । कबीर की ऊलटबासियों ने हमें बहुत कुछ दिया है । हिंदी के लोग अधिकतर संत ही होते हैं ।  यह भारत की परम्परा है !  यह भारत के सासंद न हुए दुनियां के सांसद हो गए । कैसा घाल-मेल है यह ?सरकार न हुई सरकार का बहुभाषी पिरामिड जो मुंह के बल खड़ा है पर अपने पैरों पर नहीं चलता – उसे सदा बैशाखी चाहिए । हिन्दी को यह थोड़े पता था कि कब से आंख-मिचौली का खेल भाषा केनाम पर इस देश में चल रहा है ?  रह-रह कर क्षेत्र-विशेष के लोगों को ऊकसा-ऊकसा कर भाषा विवाद को हवा दी जाती है और मसरफ सध जाने पर उन्हें शांत कर दिया जाता है ।भाई, बंधु, बहिन जी लोग – तनिक आंख खोल के देखिए न – लॉर्ड मैकाले का भूत या उसका बुत आपके बगल में ही कहीं बैठा होगा या स्थापित कर दिया गया होगा ?  अब आप उसे भगा नहीं सकते?  शुभमश्री की कविताओं की तरह हिन्दी की जब बात होगी तो कोई भी नामवर सिंह या रामचन्द्र शुक्ल या कि केदार नाथ सिंह को या उन जीवट के हिन्दी सेवियों को या उनके पूर्व के किसी भीहिन्दी पीढ़ी को या कि समस्त हिन्दी पीढ़ी को, हिन्दी का ही प्रयोग कर, किसी से भी ऊकसा करगरियवाया जा सकता है ! क्योंकि यह देश तो पिछड़ों-अगड़ों का है न, अल्पसंकख्यक-बहुसंख्यक का है न, सवर्ण-अवर्ण का है न ! तब आप ही बताइए विक्रमादित्य कि यह देश समान मौलिक अधिकार वाले किसी नागरिक का कैसे हो सकता है ? नहीं बताइएगा तो मैं जंगल में चला जाऊंगा, आप ढ़ूंढ़ते रह जाइएगा । सुनिए –    विभेद की बात न करते हुए विभेद संविधान में भी दर्ज कर दिया गया है । किसी राजनेता ने उसमें लुत्ती लगाई, कि चिंगारी लगाई और चिता धुधुआ के जल उट्ठी है, मंजिल गए लोग खड़े आग ताप रहे हैं । बाहर की दुनियां मस्त चली जा रही है – जो होगा सो देखा जाएगा । और लोग भूख से, मंहगाई से, नौकरी ना मिलने, मैट्रिक में फेल हो जाने से, आगे न पढ़ पाने से, मर रहे, सड़ रहे , किसे पड़ी है । केवल देश को विकास के रास्ते पर लाने के बड़े ही पुर जोर नारे दिए जा रहे, जयप्रकाश के आंदोलन के बाद से, इस देश में । आजादी की लड़ाई में भी शायद ही इतने नारे प्रयोग किए गए हों । शोध करना पड़ सकता है – इसमामले में !  एक नवजात शिशु क्या मां के गर्भ में आने के समय जानता है कि वह यदि भारत देशमें पैदा होगा तो उसे संविधान के तहत पैदा होते ही अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक में से कोई एकबन जाना होगा । या कि अगड़ा नहीं तो पिछड़ा बन के जीना होगा !  वर्ण एवं सवर्ण बन कर विभक्त हो कर रहना पड़ेगा । समतावादी समाज की क्या यही परिभाषा दी गई है या कि वह यहां एकनागरिक या आदमी नहीं है – इनके, कि वह. इस देश में उन्मुक्त नहीं रह सकता ?  मसलन् यहांआदमी नहीं, उनकी प्रजातियां रहती हैं और वह यहां रह कर कुछ भी कर सकती हैं !  क्या व्यवस्था है ?  जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन । शासन जनता की, तो जनता की ही बात वह बोलती होगी न ! आप हिन्दी भले बोलें पर चाहते तो अंग्रेजी मेम हो न !  बुरा नहीं मानिएगा । व्यंग्य में तो मीडिया भी बहुत ही भद्दी–भद्दी भाषा का प्रयोग करता है इन दिनों क्योंकि वह सब तो हमारे–आपके बीच से ही आता है न !  वे लोग भी क्या करें  ?  जस का तस परोस देते हैं दृश्य-श्रव्य माध्यमों में ? टी.आर.पी. तो बढ़ानी ही है न ? नहिं तोकितनों के पेट पर लात पड़ सकती है !  आप जानते हैं हिन्दी में बलात्कार को पूरा देश समझताहै । रेप को भी गांव में समझने लगे हैं गंवई – मीडिया के कारन, खास कर अपढ़ महिलाएं, बालिकाएं । धन्य हो मीडिया का कि वह भी दूभाषिया बनी ये बातें घर-घर पहुंचा रही । किंतु राजभाषा के रुप में हिन्दी को कोई भी जल्दी नहीं समझता । न तो विद्यार्थी, न तो साहित्यकार, न तो ब्यूरोक्रेसी, न ही सरकारें, ना ही मीडिया, ना ही इस प्रदेश के गांवों कीजनता, भले वह आम-जन की बोलचाल की भाषा हो ? यह वरोधाभास कैसे पनपा ?  और देश के  न्यायालयों की तो बात जानें दें ही तो अच्छा है । वे आज-कल सरकारों पर ज्यादा ध्यान दे रक्खे हैं !  वह जानती है कि सरकारें ठीक हो जाएंगी तो आम-जन की हालतें, अपने आप, सुधर जाएंगी । इसलिए वह, हिंदी और हिंदीतर के मामले में कुछ नहीं बोलती । ऐसे सब बातों पर न्यायलय बोलने लगे तो हो गया –  जमीनी न्याय का कारोबार !, मतलब कि काम-काज । यह “सब बात”केवल इस देश के हिन्दी अधिकारी समझते हैं जिनके गले में हिन्दी लागू करने के लिए काम करनेका एक ढोल बांध दिया गया है । जो आता है उसे बजा कर चल देता है – अपने रास्ते !आगे देखिए, भारतीय जो विदेशों में रहते हैं तो उनमें से कई अक्सर यह कहते पाए जाते हैं कि “विदेश से आने के बाद हिन्दी में बात करने पर बड़ा अजीब सा लगता है और कई बार तो असम्मानजनक-सा भी थोड़ी देर लगता है – यहां के कस्बाई या गँवई लोग क्या समझेंगे कि अमरीका या यूरोपीय देशों  आदि में कितनी सफाई है ? वहां सब नियम-बद्ध है, अनुशासन सब रखतेहैं । वहां हमें वहां के नियमों का पालन तो करना ही होगा न, जब डॉलर कमाने जाना होगा – वर्ना वे निकाल नहीं देंगे । वीसा ही नहीं मिलेगा । फिर वहां हिन्दी कौन बोलता-लिखता है – उसका क्या काम ?”  तो बाहर सब कुछ माना जा सकता है !पर यह भी है वहां ति –  वहां हिन्दी बोलने पर किसी न किसी भारतीय से दोस्ती या पहचान हो सकती है ! आखिर विदेश में तो अपने लोगों से पहचान रखनी ही चाहिए ही न ! न जाने कब, किन परिस्थितियों का सामना करना पड़े । पर भाई, अपना देश तो अपना देश है । यहां अंग्रेजी में झाड़ो, अंग्रेजी में लताड़ो ( मैं भी झाड़ता-लताड़ता हूँ – झूठ क्यों बोलूं क्योंकि मैंभी इस मरियल  व्यवस्था का एक रेंगता कीड़ा हूँ – एक आदमी की शक्ल में, जिसकी औकात को कोई भी कभी अपने पैरों तले रौंद देगा ग़र मैं अपने तरीके से अंग्रेजी में रौब ना झाड़ूं – थोड़ा सुनने वाला सकते में तो आ ही जाता है – कम-से-कम कोई धारदार हथियार या गोली नहीं चलानी पड़ती है न जी !) । इस प्रकार, यहां सब चलता है, रात के अंधेरे में, जैसे पेट्रोल लेने के बाद नोटों के बीच सौ, पांच सौ, हजार आदि के दो-टुक्की हुए कई नोट चुपके से बात-बातमें चला दिए जाते हैं – वैसे यहां कुछ भी चलाया जा सकता है । संसद में घूस के नोट का बाजार आपने देखा होगा ?  यह है न प्रजातांत्रिक देश !  प्रजा जैसा चाहती है सब कुछ होता है । देखिए मैं राजनीति विज्ञान की बात नहीं कर रहा । मैं तो इस देश के आम आदमी की और उसकी भाषा की बात कर रहा जिसे लोग कहते हैं  – “भारत के आम जनों की आम-बोलचाल की भाषा हिन्दी ही हैं ।” “हिन्दी भारत संघ की राजभाषा है जिसकी लिपि देवागरी है ।”!!!!!…………..पाठकों यदि यह लेख बकवास लगे – जो मैंने लिखा है, तो माफ कर देना क्योंकि मैं, वेदना झेलरहा और मुझे कृपया और पीड़ा मत पहुँचाना क्योंकि मेरी जीभ में हिन्दी का झग्गर फँसा है औरवह निकलता ही नहीं, और जब भी कोई दूसरी भाषा झाड़ता हूँ वह मेरे लिए गले की सांसत ही बनती है । कारण कि एक किसान परिवार में जन्मा हूँ, बाप-दादे स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, नाना-नानी अंग्रेजों के शासनकाल में जेल ही आते-जाते रहे, अंग्रेजों से लड़े,  देश को आजादकराने के लिए, अपना जो भी योगदान था दिया पर उनके दायों की जब हत्या होती है तो पीड़ा होगीकि नहीं –  मैं उनका वारिश जो हूँ । देखिए, आदमी की हत्या से भी ज्यादा हिंसक है उसकी भाषाकी हत्या । देश जिस भाषा में बोले और जिस भाषा को अपने काम-काज के लिए चुने यदि उसकी हत्या कर दी जाए या उसे विकलांग बना दिया जाए तो क्या होगा उस देश का – जरा सोचना ! और दिल में आए तो हिन्दी के दो शब्दों की पुष्पांजली सें मेरे इस जीवन का तर्पण कर देना – मैं आपके उस अनुग्रह के लिए सदा आपका उपकृत रहूंगा !हिन्दी का बेताल इतना सब बोल कर पूछता है राजन् से – “हिन्दी भारत देश के शासन की राजभाषा पूर्ण रुप से कब होगी ? यदि तुमने दो मिनट में नहीं बताया तो मैं तुम्हारे काँधे से उतर कर चला जाऊंगा और तुम ढूँढ़ते रह जाओगे ?”राजन् ने कहा कि – “बेताल तुमने बड़ा कठिन सवाल किया है ।  इस बार बुद्धि, विवेक कुछ भी काम नहीं कर रहा ! पर बेताल, यह करना मुझे थोड़े ही है, जनता को करना है !”बेताल ने कहा – ‘तुमने बात बनाने में समय गंवा दिया राजन् – मैं तो अब चला जंगल में ।’और बेताल चला गया । पता नहीं ! इस सवाल का उत्तर राजन् सही-सही दे पाएगा या वह अन-उत्तरितही रहेगा ?

Teri julfein

Jab bahare chaman mein khilti h,
teri julfo ki baat hoti h,ye jo sulje to din nikalta h,
ye jo uljhe to raat hoti h,inki kushbu se phool khilte h,
inko chu ke saba gujarti h,jab bahare chaman mein khilti h,
saare aalam ko neend aati h,julfe shano pe jab bhikarti h,
inke saye chirag jalte h,roshni inke sath hoti h,
mausame-gul ki jaan h julfe,ye n hoti to kuch nahi hota,
rooh fitrat ki shan h julfe,ye jo bikhre to saare aalam mein,
kusbhuo ki barat hoti h,jab bahare chaman mein khilti h.

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