प्यार का अब रहा वो जमाना नहीं

प्यार का अब रहा वो जमाना नहीं
खुद को तकलीफ में यूँ लाना नहीं


तुमको शायद नहीं है पता ये सुनो
हर जगह दर्द अपना सुनाना नहीं


क्या पता कब किसके गले से लगे
इस खुशी का कोई ठिकाना नहीं


एक मुद्दत हुई उससे मिलके मुझे
साथ मेरा था जिसको निभाना नहीं


देख जिसको मुझे मिलती खुशी
माँ है मेरी कोई और खजाना नहीं


कह रहे हैं खंडहर जिसे देखकर
गाँव मेरा है कोई वीराना नहीं
– ©speaking pen

Pc : Google

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किताबें

किताबों से इश्क़ लड़ाया है मैंने
इन्हें दिल से अपने लगाया है मैंने

हर इक वक्त ये साथ देती हैं मेरा
इन्हीं पे सब कुछ लुटाया है मैंने

खामोश होकर भी करती हैं बातें
इन्हें दर्द हर इक सुनाया है मैंने

इन्हीं पे भरोसा यही सच्ची साथी
इन्हें राज हर इक बताया है मैंने

संग इन्हीं के कई शबें हैं काटी
यूँ साथ इनका निभाया है मैंने

जितना भी सीखा अभी तक
सब कुछ इन्हीं से पाया हैं मैंने

-©पंकज मिश्रा(speaking pen)

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ये भृष्ट तंत्र सारे…..

ख़ल्वत में बैठ अपना वक्त काटते हैं।
तन्हाईयों से ये अपना दर्द बाँटते हैं।।

करते हैं शाम-ओ-सहर जी तोड़ मेहनत।
बेकसी में फिर भी ये धूल फाँकते हैं।।

खेल कर मुफ़लिसों से पैसे का खेल।
ये भ्रष्ट तंत्र सारे उनका हक़ मारते हैं।।
-©speaking pen

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मुझको तू जाने क्यूँ प्यारा लगता है

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(फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फा)

मुझको तू जाने क्यूँ प्यारा लगता है
मुश्किल तेरे बिन गुजारा लगता है

जब देखूँ ये मुख तेरा चाँद सरीखा
दिल को ये दिलचस्प नजारा लगता है

खोया खोया सा रहता हूँ मैं अब
शायद मुझपे असर तुम्हारा लगता है

तन्हाई में अक्सर तुझसे बात करूँ
चाँद बता तू कौन हमारा लगता है

जब भी तेरा जिक्र करूँ मैं बातों में
नूर जहाँ का फीका सारा लगता है

जीता है यादों के साये में उसकी
मिश्र मुझे तू इश्क़ का मारा लगता है

-©speaking pen

Note- उपरोक्त गजल जनाब कैफ़ भोपाली के एक मिसरे ‘चाँद बता तू कौन हमारा लगता है’ के आधार पर लिखी गयी है। व इस ग़ज़ल में उसका प्रयोग एक जगह मिसरे के तौर पर किया गया है।

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आ तुझे इक नाम दे दूँ

इश्क़ को अंजाम दे दूँ।
आ तुझे इक नाम दे दूँ।।

तेरे पहलू में सिमटकर।
अपनी सुबह शाम दे दूँ।।

आ तुझे इक…………।

रूठे जो तू मैं मनाऊँ।
तुझको सारे काम दे दूँ।।

गम को तेरे पी जाऊँ मैं।
खुशियों के जाम दे दूँ।।

आ तुझे इक………..।

साथ तेरे ही रहूँ अब।
तुझे अपना धाम दे दूँ।।

तुझपे हो जाऊँ फ़ना मैं।
तुझको सब इत्माम दे दूँ।।

आ तुझे इक…………।

-©speaking pen

*इत्माम- सिद्धि, सम्पूर्णता

Pic credit : PicsArt

एक बात..

एक बात मेरी तुम सुन लो।
मुझको अपना तुम चुन लो।।

रह गए अधूरे ख्वाब तेरे जो।
उन्हें संग मेरे तुम बुन लो।।

तेरा साथ मिले गर मुझको।
हाँसिल हो जाये सब मुझको।।

कितना है दर्द मेरे दिल में,
क्या खबर नहीं है तुमको?

ए चाँद मेरे मेरी सुन लो।
मुझको अपना तुम चुन लो।।

-©speaking penचित्र: google साभार

तन्हा रात

छोड़ कर साथ बुझ गए रोशन दिए।
रो रही है रात तन्हा कालापन लिए।।

चाँद बादल खा गया तारे भी छिप लिए।
पैर फैलाये अँधेरा अपना काला तन लिए।।

सूनी गालियाँ, सूनी कलियाँ, सूने घर पड़े।
काटने को दौड़ते हैं एक सूनापन लिए।।

सो गई सारी दुनिया ख्वाब आँखों में लिए।
बैठी है रजनी अकेली रोशनी का मन लिए।।

-©speaking pen

#speakingpen

Disclaimer : रात की तन्हाई को करीब से देखो तो पता चलता है तन्हाई क्या होती है? इसे शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
यदि जुड़ पाए तो प्रतिक्रिया दें…अच्छा लगेगा।😊😊

चित्र : साभार गूगल

रास्ते..

ये रास्ते हैं कठिन जरा चल सँभाल के।
रहगुज़र रुकना यहाँ जरा देखभाल के।।

पड़ना नहीं चक्कर में तुम इश्क़ जाल के।
दरिया में डूब जाओगे नहीं तुम मलाल के।।

देखे हैं हमने यहाँ कई मारे हाल के।
मिलते नहीं जवाब यहाँ हर सवाल के।।

मिलते हैं यहाँ लोग ‘मिश्र’ कई कमाल के।
रख देते हैं इश्क़ में जो दिल निकाल के।।

-©पंकज मिश्रा(speaking pen)

#speakingpen

मजदूर हूँ मैं..


मेहनत, त्याग और कर्मठता से भरपूर हूँ मैं।
स्वेद और थकावट से अक्सर रहता चूर हूँ मैं।।

लेकिन कुछ मुश्किल हालातों से मजबूर हूँ मैं।
भूँख-प्यास से लड़ता एक अदना मजदूर हूँ मैं।।
-©speaking pen

चित्र: साभार गूगल

झुलसता बचपन

◆झुलसता बचपन◆

झुलसता देख कर बचपन,
बड़ा विचलित हुआ ये मन।

चहकते थे जहाँ पंक्षी,
नहीं दिखते हैं अब वो वन।

तरसता है वो मैदान,
नहीं होते हैं अब दर्शन।

बढ़ा है बोझ बस्तों का,
हुआ कमजोर है बदन।

दादी-नानी की जगह जबसे,
एक मोबाइल ने ले ली।

अविकसित उम्र में इनको,
हुआ सब कुछ है अर्पण।

नतीजा क्या हुआ इसका,
नहीं लगता कहीं अब मन।

मिला तकनीक की दुनिया से,
आज इनको अकेलापन।
-©speaking pen

Disclaimer: आजकल बच्चों के साथ क्या हो रहा हैं इस तकनीक की दुनिया ने उन्हें एक बन्द कमरे में ही सब दिखा दिया है। जिज्ञासाएँ शांत हो रहीं हैं नयापन मर रहा है उन पर बोझ लधा है किसी की उम्मीदों का किसी के सपने का…कच्ची उम्र..ऊपर से ये भारी-भारी बस्ते…केजी में 6-7 किताबें…. और इन सब के अतिरिक्त बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं, बचपन झुलस रहा है।
बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ और लिखूँगा इस पर।

(प्रतिक्रियस्य प्रतीक्षार्थ😊😊)

चित्र साभार : Google