दिसंबर न जाने क्यूँ खास लगता है..

सर्द हवाएँ सर्द मौसम और सर्द जज्बात रखता है,

कुछ इस तरह के हालात रखता है,
दिसंबर जाने क्यूँ खास लगता है|
इन्हीं दिनों कुहरा धीरे-धीरे उत्तर में बढ़ता है,
सूरज भी यदा-कदा ऊपर को चढ़ता है|
जैसे-तैसे मुझसे मेरा ये दिल संभलता है,
लेकिन तुझसे मिलने को ये मन मचलता है|
जुदा- जुदा सा होकर भी तू पास लगता है,
कितना अनुपम ये एहसास लगता है,
दिसंबर जाने क्यूँ खास लगता है|
सुबह -शाम को हवा बर्फ सी चुभती है,
कपड़ों से लदी हुई वो और भी सुंदर दिखती है|
कंपकपाते बदन को राहत मिल जाती है,
बुझे हुए कोयले को जब वो चिंगारी दिखलाती है|
यहाँ-वहाँ देखो धरती तो आकाश लगता है,
दिसंबर न जाने क्यूँ खास लगता है|
#एहसास
– पंकज मिश्रा
#speakingpen

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दर्द बेरोजगारी का मुझे बहुत तड़पाता है…

देश में व्याप्त शैक्षिक आरक्षण के कारण व सरकार की दोषपूर्ण नीतियों से ग्रसित एक बेरोजगार छात्र का दर्द..

##बेरोजगार..पर भारी आरक्षण

अंधकार ये गुमनामी का मुझे बहुत डराता है,
दर्द बेरोजगारी का मुझे बहुत तड़पाता है|

नींदे भी रातों में मुझे कहाँ अब आती है,
पढ़ते-पढ़ते पता नही सुबह कब हो जाती है|

घरवाले धक्का देते है और जमाना चिल्लाता है,
लाख छिपाने पर भी ये दर्द आँखों से छलक जाता है|

जैसे तैसे फार्म भरकर पेपर देकर मैं आता हूँ ,
आरक्षण का दानव लेकिन पल में चट सब कर जाता है|

70 और 74 पर एससी, ओबीसी आते है लेकिन जनरल वाला 80 पर भी मिस कर जाता है|

जोरों पर युद्ध छिड़ा है वोट का काँटा यहीं अड़ा है,
आरक्षण(भीखों) की सौगातें ले नेता मंचों पर यहाँ खड़ा है|

सबकी बेहतर तैयारी है पिछड़े बनने की जंग यहाँ पर जारी है|
दुनिया के एक युवा देश में फैली खतरनाक बीमारी है|

लायक से नालायक जब कोई बेटा बन जाता है,
आरक्षण अब नहीं मिटेगा जब मंचों से नेता कोई कह जाता है|
शर्म आती है राजनीति पर और आँख से आँसू आता है,
आरक्षण की लपटों से जब देश झुलस ये जाता है|
-पंकज मिश्रा
#speakingpen
#pankajmishrapoetries

कितना दर्द भरा है अपना ये अफसाना..

कितना दर्द भरा है अपना ये अफसाना,

आवाज भेजता हूँ जरा सुनके इसे बताना|

तुम रहते हो मुझमे हरदम ,मैं तुझमें रहता हूँ हमदम,

जब भी याद तेरी आती है आँखें हो जाती है नम|

नजर जहाँ तक जाती है दिखते हो बस तुम ही तुम,

किस्मत का ये खेल है कैसा मिल न पाए हमतुम|

– पंकज मिश्रा

#speakingpen

#lovepoetries#pain

समर्पित अपना हर एक क्षण कर दो..

छिटक कर स्वेद कणिकाएँ,

धरा का आचमन कर दो|

भरी है तुच्छता मन में,
आज उसको दफन कर दो|
चाहते हो करना हाँसिल अगर कुछ,
समर्पित अपना हर एक क्षण कर दो|
मिलेगा सब तुम्हें पंकज जहां में,
चरणों में मात-पिता के शीश अपना नमन कर दो|
– पंकज मिश्रा

दीपावली के दिन एक दीप तुम जलाना..

दीपावली के दिन एक दीप तुम जलाना..
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं सभी मित्रों को
#diwali2017
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छत..लघु कथा

झुलसती हुई गर्मी के कारण सबका हाल बेहाल था ऐसे में इंद्र देव की मेहरबानी व वर्षा ऋतु होने के कारण काले बादलों ने आसमान घेर लिया था| सब अपने घरों की ओर भाग रहे थे पक्षी भी अपने घोंसलों में जा चुके थे|

हर बार की तरह फुटपाथ पर बैठा वह बालक अपनी माँ से पूछ रहा था-“माँ ये छत टपक क्यूँ रही है”?

और हर बार की तरह निशब्द माँ एकटक आसमान को निहारे जा रही थी|

-पंकज मिश्रा

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