हिंदी..

माँ सी ममता और पिता का प्यार है हिंदी।
मेरी भाषा, मेरी आशा मेरा व्यवहार है हिंदी।।
कई टूटे दिलों को जोड़ने का तार है हिंदी।
धरा से गगन तक का विस्तार है हिंदी।।
– पंकज मिश्रा

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इस जमाने में कहाँ ऐसे इंसान मिलते हैं..

आसमानों में रहकर भी जमीन का ध्यान रखते हैं।
मिलते कहाँ बड़े ऐसे जो छोटों का मान रखते हैं।।
बड़े होकर भी जो कभी न गुमान रखते हैं।
नेकदिल, इंसानियत की पहचान रखते हैं।।
भलाई में दूसरों की समय कुर्बान करते हैं।
हर मुश्किलों को पल में आसान करते हैं।।
दूसरों की खातिर हथेली पर जान रखते है।
इस जमाने में कहाँ ऐसे इंसान मिलते हैं।।

– पंकज मिश्रा

इस मिश्र का ऐसा अरमान बहुत है..

सीने में कब्र के भी उफान बहुत है।
दिल डगमगा रहा है हैरान बहुत है।।

उम्र सत्तर की फितरत है सत्रह सी।
बूढ़ों में भी यहाँ पर जवान बहुत है।।

बेवजह बहस होती जमघट है लगते।
नुक्कड़ पे पान की दुकान बहुत हैं।।

खड़े रहते अक्सर सुबह और शाम।
कहते हैं यहाँ पर सामान बहुत है।।

अक्ल,अदब,हया सब बेच है खाए।
लगता है संस्कृति से अनजान बहुत है।।

घर पर दूसरों के साये से मंडराए।
बिन बुलाए ऐसे मेहमान बहुत है।।

अतिथि को सदा ही देवता बताए।
देश अपना भारत महान बहुत है।।

मंदिर में जहाँ पर नमाज पढ़ी जाए।
एक-दूसरे का यहाँ सम्मान बहुत है।।

जो देखते है इसको बाँटने के सपने।
वो काले हृदय वाले शैतान बहुत है।।

यूँ ही सदा मिलकर सौहाद्र से रहे हम।
इस मिश्र का ऐसा अरमान बहुत है।।

-पंकज मिश्रा

Pic credit: indian express

हे युग पुरुष! सदियों तक तुमको याद करेगा हर जन..(अटल जी)

धरती पर मानवता का एक नया अध्याय थे वो।
सदा सिखाता रहे हमें ऐसा एक पर्याय थे वो ।।

राजनीति के दलदल में थे खिले हुए वो एक कमल।
सरल स्वभाव और जनवादी कहलाते थे अटल।।

कूटनीति के ज्ञाता और प्रखर थे वक्ता।
उनके जैसा कोई नहीं हमें मिल सकता।।

नैतिकता की सविता थे वो।
ज्ञानदायिनी कविता थे वो।।

विपदाओं से खेले थे वो।
संघर्षों को झेले थे वो।।
जनता, सत्ता और विपक्षी।
सबके प्रिय अकेले थे वो।।

कालजयी रचनायें उनकी और अनोखी शैली थी।
निर्मल मन था उनका और शख्शियत न मैली थी।।

राष्ट्रधर्म का पालन करते कर दिया समर्पित जीवन।
हे युग पुरुष! सदियों तक तुमको याद करेगा हर जन।।

-पंकज मिश्रा

वैश्या..

कितना मुश्किल जीवन होता है एक वैश्या का। ये तो हम जानते ही हैं, इन सब में जब किसी लड़की को जबरदस्ती धकेल दिया जाता है तो क्या बीतती होगी उस पर।
भारत में कई जगह छोटी बच्चियों को बेच दिया जाता है,और फिर उन्हें जबरदस्ती जिस्मफरोशी के धंधें में उतार दिया जाता है। कितने बचपन बर्बाद हो जाते है, कितनी पीड़ा सहनी पड़ती है। और ये समाज उन्हें अस्वीकार कर देता है, क्योंकि हम सब नियम-कानून वाले लोग हैं न।
इसी पर आधारित वैश्याओं के जीवन को व्यक्त करती है यह कविता…

//वैश्या//

तरसती रही उम्र भर वो रात की निंदिया को।
न हाँसिल कर सकी वो उस पावन बिंदिया को।।

स्वप्न बचपन के उसके स्याह सारे हो गए थे।
बिछड़कर अपने ही उसके किनारे हो गए थे।।

न जाने क्या बना डाला दरिंदों ने उसे था।

पैसे कमाने जिस्म उसका बेचता था।
खेल बिस्तर का वो उससे खेलता था।।

रात उसकी एक सजा सी बन गई थी।
लड़की से वह एक औरत बन गई थी।।

दर्द जीने का जरिया हो गया था।
जीवन दुखों का दरिया हो गया था।।

एक घर में ही सिमटकर रह रही वो।
इस जमाने के सितम को सह रही वो।।

कौन अब उसका बनेगा सहारा।
कैसे बूढ़े जिस्म से होगा गुजारा।।

क्या कभी दुनिया उसको अपनाएगी?
या नर्क में वो फिर ढकेली जाएगी?

कहने को संविधान ने दी सभी को समानता।
फिर समाज ये हमारा क्यूँ नहीं ये मानता??

-©पंकज मिश्रा
( write for change)

सच पता है..

कभी गुजरो तो एक पल को पैदल किसी फुटपाथ से, रूह कांप जाती हैं सर्द रातों में हज़ारों की संख्या देखकर।
और आप लोग मंचों से बड़े-बड़े भाषण देते हो गरीबी कम हुई, भुखमरी कम हुई, बेरोजगारी भी कम हो रही है। अरे, कभी आकर रहकर देखो उस झुग्गी में जो बरसात में पानी से तर होती है तो गर्मी भट्टी की तरह गर्म, सर्दियों की हवाएँ तो जमा सा ही देती हैं।
मीडिया भी आपके जन्मदिन, आपके कुत्तों की भी खबरें छप जाती है और यहाँ लोग भूँख से दम तोड़ देते है उसे दबा दिया जाता हैं। दोस्तों लिखना तो बहुत चाहता हूँ इस विषय पर मगर लोगों को कम पढ़ने की आदत भी है। इसलिए कविता के माध्यम से जमीनी लोगों का दर्द, तकलीफ, हकीकत आपको सौंपता हूँ।
Published poem : At Amarujala kavya

//सच_पता_है..//

सच पता है बता क्यों नही देते।
घुट रहे हो जता क्यों नही देते।।

डर रहे हो अंजाम ए हकीकत से।
फिर सच को झूँठ से छिपा क्यों नही देते।।

तुम्हें पता है,ये दुनिया है।
ये सब कुछ जानती है।।

कैसे, क्यों, क्या प्रश्न अनेक है करती।
कहाँ सच ये मानती है।।

कल मिला था, मैं एक सच से।
दिया था तोड़ दम एक मासूम ने तड़पकर भूँख से।।

चीखकर बोला मैं सच से।
कैसे छिप सकता है तू झूँठ से।।

सुना है मिलने लगे है झूँठ को सच करने के पैसे।
दिखाना चाहते जो हो दिखाओ खुद को वैसे।।

लगता है ये मीडिया भी बेवा हो गई है।
महज पैसे कमाना इनकी सेवा हो गई है।।

कहकर इतना मुझसे सच हो गया चुपचाप।
क्यों पूँछते हो मुझसे सब जानते हो आप।।
– ©पंकज मिश्रा

Pic credit: Google

(कृपया प्रतिक्रिया जरूर दें हो सकें तो मूल रूप में साझा भी करें तभी ऐसी रचनाओं की सार्थकता सिद्ध हो)
#सच #हकीकत #राजनीति #मीडियाराजनीति #देश

वो बात जो तुझे बताई ही नहीं..

कभी बैठो तो निकालें इस दिल में क्या-क्या भरा पड़ा है तुम्हारा। कभी हालात तो कभी जज्बात के चक्कर में अधूरी रह जाती हैं जाने कितनी दास्ताएं..।

वो बात जो तुझे बताई ही नहीं।
तू आई जैसे दिल में ऐसे कोई आई ही नहीं।।

रुक सी गयी थी साँसे तुझे देखते ही।
सोचकर मुझे उस रात नींद आई ही नहीं।।

जेहन में तू ही तू कई दिन छाई रही।
मेरी खुद से कई दिन लड़ाई रही।।

तेरे दिल के रास्तों में खो गया था कहीं।
मगर तू तो मुझे नजर आई ही नहीं।।

चाहने लगा था तुझे ये दिल।
मगर तू मुझे कभी चाही ही नहीं।।

मैं तो तेरा हो ही गया था।
तू मेरे हिस्से कभी आई ही नहीं।।

वो बात जो तुझे बताई ही नहीं।
– पंकज मिश्रा

( अगर मन को छुये तो प्रतिक्रिया जरूर दें)
Image credit: Google

भूँख..

अवमूल्यन,आरोहण का होता है संदर्श यहाँ।
जाने कितने दरिद्र मर जाते है प्रति वर्ष यहाँ।।

दो वक्त पेट भरने को संकट छा जाते हैं यहाँ।
हर रोज फेंकते है भोजन महलों से व्यर्थ वहाँ।।

तड़प-तड़प के मर जाते हैं भूँख से बच्चे जहाँ।
कैसे कोई रह सकता है सुख और चैन से वहाँ।।

कर दो रहवर कुछ ऐसा जी सके चैन से सब यहाँ।
सबको नसीब हो भोजन भूँखा न कोई मरे यहाँ।।
©पंकज मिश्रा

Pic credit: IndiaToday

काला धुआँ..

न जाने कितने लोग असमय काल के गाल में समा जाते हैं इस धूम्रपान की वजह से। इसी पर आधारित ये कविता “काला धुआँ”…
यहाँ भी धुआँ, वहाँ भी धुआँ।

फैल चुका है, दो जहां में धुआँ।।
क्यूँ खोद रहे हो,खुद ही कुआँ।
निगल जायेगा तुमको, ये काला धुआँ।।
कभी चिमनियाँ, कभी उंगलियाँ।
उगलती हैं रहती, ये काला धुआँ।।
डर था जिसका, वही है हुआ।
फैल रहा है, ये काला धुआँ।।
रोको-रोको, बहुत है हुआ।
ये सिगरेट,बीड़ी है इक जुआ।।
इनसे भला क्या, किसी का हुआ।
मिटा जायेगा ये,तुमको धुआँ।।

©

पंकज मिश्रा

Pic credit: Google/all wallpaper
(कृपया धूम्रपान को न कहें)

सितारा टूट जाता है..

जीवन में न जाने कितनी दफह ऐसा होता है जिसे चाहो वो साथ नहीं देता इसी भाव से परिपूर्ण ये कविता-

न बैठों तुम भरोसा कर फलक पर।
न जाने कब गिरेगा क्या सड़क पर।।

भरोसा पल में ही यहाँ पर टूट जाता है।
जिसे चाहो अकीदत से वो छूट जाता है।।

सुना है नसीब भी यहाँ न काम आता है।
चमकते ही चमकते सितारा टूट जाता है।।

हर एक दिन यहाँ नई मुश्किल लाता है।
सदा कोई यहाँ पर न खुशियाँ पाता है।।

है जितना खास जो वही सब लूट जाता है।
चमकते ही चमकते सितारा टूट जाता है।।

बुढ़ापें में मातृ-पितृ को बेटा भूल जाता है।
जिसे सींचा प्यार से वो घृणा के शूल लाता है।।

लगाई आस थी जिससे वो सहारा छूट जाता है।
चमकते ही चमकते सितारा टूट जाता है।।
©पंकज मिश्रा

(आपकी प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं)

Pic credit: netky.sk/google