साथ यूँ ही सदा तुम देना बहना..

#रक्षाबंधन गीत..2017

बाँध कर डोर रेशम की हाथ पर,

उसने तिलक जो सर पर लगाया मेरे|

मन हर्षित हुआ तन भी खिल गया,

दिल ने दे दी दुआ, हो पूरे  सब अरमां तेरे|| 【1】

चाहे बचपन हो ,या अभी का क्षण
मां सी ममता का मुझको कराया स्मरण|
जब जरूरत पड़ी एक हमदर्द की,
तुम ही बन गए, मित्र सच्चे मेरे|| 【2】

अब तुम्हें क्या बताऊँ, दिल का क्या है कहना?
साथ यूँ ही सदा तुम देना बहना|
हो  मुख पर तबस्सुम सदा तेरे,
तेरे सारे दुःख हो  जाएं मेरे,
मेरे सारे सुख हो  जाएं तेरे|| 【3】
#एहसास
– पंकज मिश्रा

टपक रहा आकाश..

पानी गिर रहा है हो रहा है अद्भुत एहसास|

एक खेत की आज बुझ जाएगी प्यास||

सूखे पोखर, सूखी धरती गर्मी का था त्रास|

देख धरा का दर्द ,आज टपक रहा आकाश||

#एहसास

– पंकज मिश्रा

उनको भी बतला दो जो पड़े हुए खा रहे है पाव..

गड्ढे, किस्मत ,नंगे पाँव चिंता का न कोई भाव,

चेहरे पर भी सिकन नही है आगे बढ़ने का है चाव|

दौड़ रहे है कीचड़ में भी देखो लगा रहे है दाव,

उनको भी बतला दो कोई जो पड़े हुए खा रहे है पाव|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा..

अंधेरों में रश्मि की चमक जब चंदा छोड़ जाएगा;

मुकम्मल हो अमन और चैन अगर,

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा|
वो घाटी में नमाज़ों  के बाद पत्थर फेंक देते है,

मजहब के नाम पर आतंकी रोटी सेंक लेते है|
कहीं पर तो आतंकियों के पोस्टर लगाए है, 

हर एक दिन कर रहे कोई न कोई हत्याएं है|
खून के दागों को दामन से कोई कैसे मिटाएगा?

शहीदों की पुण्यात्मा को श्रद्धाजंलि कैसे दिलाएगा?
मुकम्मल हो अमन और चैन अगर,

मनाने में ईद फिर मजा कुछ और ही आएगा|

#एहसास

#speakingpen

– पंकज मिश्रा

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है..

कृषकों की पीड़ा को व्यक्त करती  एक कविता..
घुट- घुट के मर जाता है दुख के आँसू वो पीता है,
जिंदा रखने को खुद को जाने वो कैसे जीता है;

कहने को है लोकतंत्र मगर अपने हक़ से वो रीता है,

कुछ धनवानों के हाथों में उसके जीवन का फीता है|

कहने को आज़ाद हुए हम सन सैतालिस की पंद्रह को,

लेकिन गले में डाल दिया है राजनीति के फंदे को|

मौसम की भी मार पड़ी है अजब सी एक लाचारी है,

जीवन का विकराल रूप यह भूंखे पेटों पर भारी है;

 विकास रूपी पंख लगाकर जहां उड़ने की तैयारी है,

जीवन की हत्या करने का खेल यहां पर जारी है|

जो भारत का पेट है भरता वो यहां पर भूँखों मरता,

सरकारों की कृषकों के प्रति भी  जिम्मेदारी है,

उनके हित में निर्णय लेने की अब बारी है|

#एहसास

-पंकज मिश्रा

बचपन बेताब है..

नापने को आसमां रस्सियों पर, बचपन बेताब है;

नई उम्मीदें , नई आशाएँ, नए – नए ख्वाब है|

पंख भी नही है,और उड़ना बेहिसाब है;

झूलती हुई ज़िन्दगियाँ, मासूमियत की किताब है|

#एहसास

 -पंकज मिश्रा

Tere is roop ko dekhne tarsa ye jahan sara hai..

रंग बिरंगा अद्भुत सा,एक मूक नज़ारा है|

मौसम भी अनुकूल बहुत है, ये दृश्य बड़ा ही प्यारा है||

तेरे इस रूप को देखने, तरसा ये जहां सारा है|

इन निर्मम हांथो का देखो, मूकों को सहारा है||

#एहसास

-पंकज मिश्रा

माँ

माँ के बारे में लिखना असंभव लेकिन एक छोटा सा प्रयास..आज मातृत्व दिवस सभी माताओं को शुभकामनाएं 
माँ धरती से आसमां तक का है विस्तार ||

जीवन की इस बगिया में है फूलों का उपहार ||

माँ प्रकृति की गोद में है नदियों की धार||

गीता , कुरान, गुरु ग्रंथ का है माँ ही  सार||
माँ अंदर मौजूद है, माँ ही है बाहर||

माँ ही मंदिर, माँ ही मस्जिद,माँ ही है गिरजाघर||

माँ से ही उत्पन्न हुए है माँ ही पालनहार||

माँ से ही आकार मिला है माँ में ही हो जाएगा सबका समाहार||
मेरी भी विनती सुन लो माँ, मुझ पर करो उपकार||

जीवन के मरुथल में भर दो जल रूपी कासार ||

रहे न कोई छल मन में और न हो व्यभिचार||

कृपा की बारिश कर दो ऐसी हर स्वप्न हो साकार ||

– पंकज मिश्रा

#मातृत्वदिवस2017

मजदूर

आज विश्व मजदूर दिवस के अवसर पर  एक मजदूर को आपके सामने चरितार्थ करने का एक प्रयास ..
‘मजदूर’

बहुत कुछ हार जाता है,

महज एक चंद रोटी को ;

क्या क्या नही करता,

निभाने जीवन कसौटी को;

बड़ी जिल्लत उठाता है, 

मगर बस सहता रहता है; 

कभी होकर खड़े किसी खेत में,

कभी रहकर पड़े दिन भर रेत में;

फर्ज अपना निभाता है|

गिराकर चंद बूँदे स्वेद की धरा पर,

मुकद्दर अपना बनाता है| 

बहुत कुछ हार जाता है …!!

#मजदूर

– पंकज मिश्रा

#internationallabourday

#speakingpen

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