आखिर कब तक..

क्या सीमा पर सैनिक का मरना रोज जरूरी है?

बता क्यों नहीं देते मुझको ऐसी क्या मजबूरी है।।
एक बार तुम घुसे वहाँ तो सर्जिकल दिखा दिया।
फिर घुसकर के सफाया करने में कैसी ये देरी है।।

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वरदान दे माँ..

ज्ञान, गुण, शील व विवेक का वरदान दे माँ।
होंसलों को मेरे भी आज नव परवान दे माँ।।
काम, क्रोध, वासना का हो समूल नाश माँ।
चेतना का ऐसा आज मन में विज्ञान दे माँ।।
-©पंकज मिश्रा

माँ की दुआ..


हदें, बंदिशें, सीमाएँ सब टूट जाएँगी।
दुआएँ माँ की जब मेरे पास आएँगी।।

ए जमीं आसमां पाताल सब सुन लो।
मेहनत मेरी यूँ ही न अबस जाएगी।।

है मुश्किल डगर जानता हूँ मैं यह।
रोशनी की किरण कोई मिल जाएगी।।

करूँगा भागीरथ सा समर्पण मैं भी।
सफलता की गंगा फिर धरा आएगी।।

– ©पंकज मिश्रा (speaking pen)

राजनीति..

वादों की है झड़ी लगी और यहाँ रुसवाई है,
दौर चुनावी है आया खुशियाँ भी अस्थाई है।

कोई रोटी को तरसे किसी के हाथ मिठाई है,
युवा भटकते मारे-मारे शक्लें भी मुरझाई है।

धन और प्रतिष्ठा ने सबकी बुद्धि भटकाई है,
तेरे- मेरे के चक्कर में होती रोज लड़ाई है।

लोकतंत्र के देश में राजनीति एक खाई है,
चला बदलने जो इसे उसकी शामत आई है।

– पंकज मिश्रा (speaking pen)

Pic credit: codechaoss.info

गम

जहाँ छोड़ा था तुमने, वहीं अब भी खड़े हैं हम।
महज कहने को नजरों में, सभी की बड़े हैं हम।।
बताएं कैसे काटे हैं, ये दिन अब तक बिना तेरे।
छिपाकर दर्द सीने में, खुद ही से लड़े हैं हम।।

हवाएँ पूष की ठंडी, दिखा देती हैं अपना दम।
पतझड़ के पत्तों सा, बिखरता है मेरा ये गम।।
कभी आकर जरा से तुम, खबर मेरी लिए होते।
मेरे हिस्से से हो जाते, ये सैलाब थोड़े कम।।

– पंकज मिश्रा (speaking pen)

उठ खड़ा हो आसमां पर राज तू कर..

फिर वो आया तंज कसकर,
मुख पे अपने हास्य भरकर।
तुमसे न हो पायेगा अब,
चल दिया यह सब कहकर।

बैठा रहा निस्तेज सा मैं,
सिर को अपने पकड़कर।
असफल जो हो गया था,
रात-दिन मेहनत करकर।

ऊहापोह मन में बहुत थी,
सामना असफलता से कर।
और ताने भी बहुत थे,
लोगों की जुबान पर।

फिर समझ आया मुझे था,
एक नन्हीं चिड़िया देखकर।
दो ही मिलते रास्ते हैं,
जिंदगी के सफर पर।

गिर रही थी बार-बार,
थोड़ा-थोड़ा सा फुदककर।
बल दिया पंखों पे इतना,
उड़ गई खुद के परों पर।

सारे सुख हैं क्षणिक,
आज इनका त्याग तू कर।
छोड़ सारी व्यथाएँ,
एक नई शुरुआत तू कर।

प्रश्न खुद से किया सहसा तभी,
क्यूँ पड़ा है व्यर्थ में तू यहाँ पर?
साहसी का साथ खुद देता जहां है,
उठ खड़ा हो आसमां पर राज तू कर।

-पंकज मिश्रा (speaking pen)

Pic credit: jamienreaa.com

कामुकता

इच्छाएँ हैं आसमान सी, काम जगत का तंत्र है।

बँधे बँधे से फिरते हैं सब, कहाँ कोई स्वतंत्र है।।

डोरे नजरों के गिरते हैं, रोज-रोज अब हर जगह।

इन सबसे बचने का सुनलो, खुद में ही एक मंत्र है।।

यहाँ उठाई वहाँ गिराई, न जाने किस किस पर आई।
हया नहीं अब ढूंढे मिलती, इन नजरों में मुझको भाई।।
प्रेम पचीसी पढीं जा रही, शिक्षाओं के मंदिर में अब।
रूप, रंग और हुश्न के पीछे, होती दिखती रोज लड़ाई।।

मर्यादा की सारी सीमाएं, धीरे धीरे टूट रही है।
हाव-भाव और तन-मन से, कामुकता फूट रही है।।
हे त्रिभुवन के स्वामी, कुछ सदबुद्धि दो इन कलियों को।
पश्चिम की फूहड़ता से, पीछे निज संस्कृति छूट रही है।।
– पंकज मिश्रा(speaking pen)

pic credit: Google

हराम की खाने को हर कोई तैयार है

चढ़ा सभी को चुनाव का बुखार है।
ये हमदर्दी, आरक्षण सब बेकार है।।

कहाँ बैठे थे हटाने को दाग दामन से।
बन बैठे यहाँ पर सब दागदार है।।

उठ गया है विश्वास मेहनत से सभी का।
हराम की खाने को हर कोई तैयार है।।

– पंकज मिश्रा(speaking pen)

हाँ मैं ख़्वाब देखता हूँ

हां,मैं ख्वाब देखता हूँ।
बेहिसाब देखता हूँ।

टूटे को जोड़ने का,
लहरों को मोड़ने का।

जो रोकता है मुझको,
इंसान होने से

उस अहं को तोड़ने का,
मैं ख्वाब देखता हूँ।

देखे जो खुद को बस,
और दूसरे को काटे।

जाति-धर्म के नाम पर,
जो दूसरों को बाँटे।

उस तन-मन को छोड़ने का,
मैं ख्वाब देखता हूँ।

भूँखे को देखकर भी,
जो मुँह फेर खाये।

और निर्दोष मूक जीवों की,
अंतड़ियाँ भी नोंच खाये।

जो रक्तपान करने से भी न हिचकिचाए
और खुद को भद्रता का देवता बताए।

ऐसों के सिर फोड़ने का,
मैं ख्वाब देखता हूँ।

खुद एक वक्त खाकर,
मुझको बड़ा किया।

शिक्षा की खातिर मेरी,
सब कुछ लुटा दिया।

उन माँ-बाप के अश्रुओं को पोंछने का,
मैं ख्वाब देखता हूँ।

हाँ मैं ख़्वाब देखता हूँ।
बेहिसाब देखता हूँ।।

– पंकज मिश्रा

#speakingpen

सोचता हूँ तुझे क्या लिखूँ?

सोचता हूँ तुझे क्या लिखूँ?

डूबती शाम, उनींदी सुबह।

सुबह की धूप, परियों का रूप।

मचलती लहरें, प्रकृति का विरह।।
सोचता हूँ तुझे क्या लिखूँ?
कोयल की कूक, भँवरे की हूक।
धरा का व्यवहार, गगन का विस्तार।
सादगी की मूरत, प्रेम का प्रसार।।
लाज का श्रृंगार, सादगी का आचार।
कल्पना की किरण, कोई गूढ़ विचार।।
तुझे समंदर की लहर लिखूँ या नदी का विसर्पण।
तुझे माँ का प्यार लिखूँ या तात का समर्पण।।
सोचता हूँ तुझे क्या लिखूँ?
अलसाई आँखों की नींद।
या सफलता की उम्मीद।।
तुझे जीवन की आशा लिखूँ।
या मन में व्याप्त निराशा लिखूँ।।
सोचता हूँ तुझे क्या लिखूँ?

©पंकज मिश्रा

Pic credit:Bestanimation.com